केदारनाथ धाम में आस्था के साथ खिलवाड़? BKTC की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
केदारनाथ में आम भक्तों के लिए नियम, सेलिब्रिटीज के लिए रेड कार्पेट?

केदारनाथ:
बाबा केदार के धाम में एक तरफ आम श्रद्धालु कड़कड़ाती ठंड में घंटों लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर मंदिर समिति के संरक्षण में ‘वीआईपी कल्चर’ अपने चरम पर है। हाल ही में प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर का मंदिर परिसर के पास रील बनाने का वीडियो वायरल होने के बाद बीकेटीसी (BKTC) की दोहरी नीति पर सवालिया निशान लग गए हैं।
नियमों की धज्जियां उड़ाता सेलिब्रिटी प्रेम
प्रशासन ने धाम की मर्यादा बनाए रखने के लिए फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर सख्त प्रतिबंध लगाया है। लेकिन वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैलाश खेर पूरे लाव-लश्कर के साथ मंदिर परिसर में वीडियोग्राफी कर रहे हैं। जनता पूछ रही है कि क्या ये नियम केवल साधारण नागरिकों के लिए हैं? क्या हेमंत चतुर्वेदी और मंदिर समिति ने इन कलाकारों को नियमों से ऊपर होने का ‘वीआईपी पास’ जारी किया है?
जनता का फूटा गुस्सा, समिति पर गंभीर आरोप
सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि जिस स्थान पर फोन ले जाना तक दूभर है, वहां इन कलाकारों को रील बनाने की अनुमति किसने दी?
हेमंत चतुर्वेदी के खिलाफ नारेबाजी, इस्तीफे की मांग
धाम में हाल ही में हुए हंगामे के दौरान श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने बीकेटीसी से जुड़े हेमंत चतुर्वेदी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। “हेमंत चतुर्वेदी मुर्दाबाद” और “वीआईपी गेट बंद करो” के नारों से पूरा केदारपुरी गूंज उठा। आक्रोशित लोगों का आरोप है कि मंदिर समिति के कुछ लोग खास रसूखदारों को फायदा पहुँचाने के लिए नियमों को ताक पर रख रहे हैं, जबकि आम भक्त धक्के खाने को मजबूर है।
मर्यादा का उल्लंघन: आस्था के केंद्र को ‘शूटिंग स्पॉट’ में तब्दील करने से स्थानीय लोग और तीर्थ पुरोहित भी आहत हैं।
नैतिकता और इस्तीफे की मांग
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो जाएं, तो व्यवस्था का पतन निश्चित है। बीकेटीसी के पदाधिकारियों के खिलाफ जो नारेबाजी हो रही है, वह केवल शोर नहीं बल्कि ठगे गए आम भक्त की आवाज है। मांग उठ रही है कि इस पक्षपात के जिम्मेदार लोगों को तुरंत पद से हट जाना चाहिए।
सीधी बात:
बाबा केदार के दरबार में ‘त्रिवेदी’, ‘द्विवेदी’ और ‘चतुर्वेदी’ के नाम पर चल रही यह व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। अगर आस्था के केंद्र में भी आम और खास का फर्क खत्म नहीं हुआ, तो यह देवभूमि की परंपराओं के साथ बड़ा खिलवाड़ होगा।


