एक राज्य की थकान :- आंदोलन से जन्मा, आंदोलन में जीता उत्तराखण्ड
आंदोलन ही आख़िरी रास्ता क्यों ?

उत्तराखंड/देहरादून/यूकेसाइबरन्यूज़:-
देवभूमि से दानव भूमि की तरफ अग्रसर उत्तराखण्ड:-
एक पीड़ा, एक प्रश्न, एक दस्तावेज़
उत्तराखण्ड की कहानी सिर्फ़ पहाड़ों की नहीं है, यह आंदोलनों की आग में तपे हुए लोगों की कहानी है। आज इस दुखद सच्चाई को लिखते हुए वही कसक लौट आती है,क्यों हर सही बात मनवाने के लिए इस राज्य को पहले जलना पड़ता है?
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन…
बस वही याद कर लीजिए। सैकड़ों ने जान दी, हजारों ने सड़कें नापीं, और एक पूरी पीढ़ी ने अपने हिस्से की उम्र लोकतंत्र को समझाने में लगा दी कि हम कोई संख्या नहीं, नागरिक हैं। उस संघर्ष की राख अभी ठंडी भी नहीं पड़ी कि आज फिर उसी पहाड़ को हर माँग पर, हर हक़ पर, हर ज़रूरत पर हर समय आंदोलन का सहारा लेना पड़ रहा है। यही सोच है क्या राष्ट्रीय पार्टियों की? कि पहाड़ियों को कुछ तभी मिलेगा जब वे पहले सड़कों पर उतरेंगे?
यही पीड़ा आज के उत्तराखण्ड की असल दस्तावेज़ है….
एक ऐसा प्रदेश जिसे देवभूमि कहा गया, पर जिसे अपनी ही ज़मीन पर इंसाफ़ के लिए दानव क़द के संघर्ष से गुजरना पड़ता है।
कभी लगता है कि यह धरती सिर्फ़ संसाधनों का गोदाम बनकर रह गई है। जंगल, जल, ज़मीन, खनन, नौकरियाँ, ट्रांसफ़र,सब कुछ मानो किसी अदृश्य सौदे का हिस्सा हो। आम आदमी सिर्फ़ आँकड़ा है, और उससे बड़ा कोई नहीं। फिर सवाल उठता है… अगर सब कुछ सौदे पर टिका है, तो गाँवों के खाली घर किस पर टिके हैं? वो माँएँ, जो अपने बेटों की नौकरी की राह ताकते-ताकते बूढ़ी हो गईं,उनका दर्द किस फ़ाइल में दर्ज है?
युवा बाहर जा रहा है, गाँव सूने हो रहे हैं, खेतों में घास ऊँची हो रही है, पर सत्ता को सिर्फ़ रिपोर्ट में “विकास” चाहिए। पहाड़ का सच तो यह है कि यहाँ उम्मीद से ज़्यादा मजबूरी पल रही है। इंसान कम, समस्याएँ ज़्यादा हो गई हैं।
सबसे बड़ी विडंबना…
यह कि यहाँ की लड़ाई कभी मुद्दों की नहीं, माइनस-प्लस की बनाकर छोड़ दी जाती है,कौन किसके खिलाफ़ है, यही कहानी बना दी जाती है। और वास्तविक पीड़ा? वो राजनीति की भीड़ में दबकर रह जाती है।
आज जब उत्तराखण्ड देवभूमि से दानव भूमि की दिशा में खिंचता सा लगता है, तो यह सिर्फ़ व्यवस्था की गलती नहीं यह उस सोच का आईना भी है जो कहती है कि पहाड़ियों को हक़ चाहिए, तो पहले संघर्ष करो, खून पसीना बहाओ, फिर देखेंगे। क्या यही मर्यादा रह गई है लोकतंत्र की?
यह लेख कोई विश्लेषण मात्र नहीं…
यह एक दर्द है, एक सवाल है, और एक चेतावनी भी। अगर हालात ऐसे ही चलते रहे, तो उत्तराखण्ड फिर एक नए आंदोलन की देहलीज पर खड़ा होगा। फर्क बस इतना होगा… इस बार लड़ाई सिर्फ़ राज्य की नहीं, अपनी पहचान बचाने की होगी।
उत्तराखण्ड आज दुख, संघर्ष और अनिश्चितता के बीच खड़ा है। लेकिन मैं विश्वास रखता हूँ कि जब तक पहाड़ों में इंसानियत की आखिरी सांस है, तब तक उम्मीद भी जिंदा है। देवभूमि को दानव भूमि बनने से रोकना हमारी जिम्मेदारी है। यह संघर्ष मेरी, आपकी और हर उस पहाड़ी की सांसों में बसा है जो अपनी मिट्टी से प्यार करता है।
मेरी आँखों और दिल से लिखा उत्तराखण्ड का सच, उसकी पीड़ा और उसकी पुकार…..
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