
उत्तराखंड।देहरादून:-
उत्तराखंड के डीजीपी दीपम सेठ ने स्पष्ट किया है कि पुलिस का मुख्य काम अपराध रोकना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि व्यक्तिगत या सिविल मामलों में हस्तक्षेप करना।
सिविल मामले (Civil Cases) वे होते हैं जो व्यक्तियों, संस्थाओं या संगठनों के बीच के निजी विवादों से संबंधित होते हैं। ऐसे मामलों में आमतौर पर किसी को जेल भेजने के बजाय नुकसान की भरपाई या अधिकारों की बहाली पर जोर दिया जाता है।
मुख्य सिविल मामले इस प्रकार हैं:
संपत्ति और जमीन के विवाद (Property Disputes)
जमीन के मालिकाना हक (Ownership) को लेकर झगड़ा।
किरायेदार और मकान मालिक के बीच विवाद।
पुश्तैनी जमीन का बंटवारा।
कब्जे (Possession) से संबंधित मामले।
पारिवारिक मामले (Family Matters)
तलाक (Divorce) और अलग होना।
बच्चों की कस्टडी (Child Custody)।
भरण-पोषण (Maintenance/Alimony)।
गोद लेना या उत्तराधिकार (Inheritance) के मामले।
अनुबंध या कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन (Breach of Contract)
दो पक्षों के बीच हुए समझौते का पालन न करना।
व्यापारिक लेन-देन में शर्तों का उल्लंघन।
नौकरी या सेवा से जुड़े अनुबंधों के विवाद।
टॉर्ट्स (Torts / Civil Wrongs)
मानहानि (Defamation): किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना।
लापरवाही (Negligence): किसी की लापरवाही से दूसरे को नुकसान होना।
अतिचार (Trespass): बिना अनुमति किसी की संपत्ति में प्रवेश करना।
पैसे की वसूली (Recovery of Money)
उधार दिए गए पैसे वापस न मिलना।
चेक बाउंस के कुछ मामले (हालांकि कुछ मामलों में यह अर्ध-आपराधिक श्रेणी में भी आते हैं)।
पुलिस हस्तक्षेप क्यों नहीं कर सकती?
अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction): सिविल मामलों का निपटारा केवल दीवानी न्यायालय (Civil Court) कर सकता है। पुलिस के पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि जमीन किसकी है या समझौता क्या होना चाहिए।
भ्रष्टाचार की संभावना: ऐसे मामलों में अक्सर आरोप लगते हैं कि पुलिस किसी एक पक्ष का पक्ष ले रही है। इसलिए डीजीपी ने कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी है।
सरल भाषा में:
अगर झगड़े में मारपीट, चोरी या कोई बड़ा अपराध नहीं हुआ और मामला केवल हक, संपत्ति या पैसे का है, तो वह सिविल मामला है और पुलिस इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।


