
देहरादून।दिल्ली।ukcybernews
जंग सात समंदर पार, धमाका शुरू रसोई से!
कहने को तो दुनिया के नक्शे पर ईरान और इजरायल हमसे हजारों मील दूर हैं, लेकिन उनकी आपसी रंजिश की पहली ‘मिसाइल’ सीधे हमारे किचन के बजट पर गिरी है। बड़े-बड़े मंचों से दावे किए जा रहे हैं कि “भारत पर इस युद्ध का असर नहीं पड़ेगा”, पर हकीकत ये अखबार की कतरन चीख-चीख कर बता रही है। सच तो यही है कि किसी भी संकट की पहली मार सरकार हमेशा हमारे चूल्हे से ही शुरू करती है।
1. 60 रुपये की ‘चुपचाप’ मार
देहरादून की ये खबर एक चेतावनी है। घरेलू गैस सिलेंडर पर 60 रुपये और कमर्शियल पर 114.50 रुपये की बढ़ोत्तरी कोई मामूली बात नहीं है। ये सीधा हमला है उस आम आदमी की जेब पर, जो पहले ही महंगाई से जूझ रहा है। जब रसोई महंगी होती है, तो घर का पूरा अनुशासन बिगड़ना तय है।
2. 25 दिन का इंतज़ार: ये बैकलॉग है या डर?
गैस बुकिंग के बाद 25-25 दिन की लंबी वेटिंग! ये आंकड़ा डराने वाला है। क्या ये आने वाले बड़े संकट की आहट है? जब सिलेंडर के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़े, तो घर की औरतों के मन में ये खौफ बैठना लाज़मी है कि कहीं आने वाले दिनों में चूल्हा जलना ही दूभर न हो जाए। सप्लाई की ये सुस्ती बता रही है कि पर्दे के पीछे सब कुछ ठीक नहीं है।
3. “अब सब गड़बड़ होना तय है”: महिलाओं की सिसकी
अखबार में छपी इन महिलाओं के चेहरों को देखिए। जब अंजू कहती हैं कि “समय भी बढ़ा और दाम भी,” और कांती देवी का ये कहना कि “रसोई का बजट बिगड़ गया है,” तो ये सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि हर भारतीय घर की गृहणी की चिंता है। रसोई की कमान इन्हीं के हाथ में होती है, और जब यहाँ से बजट बिगड़ता है, तो उसका असर बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर की खुशहाली तक पड़ता है।
4. पेट्रोल-डीजल: वो बम जो कभी भी फट सकता है
अभी तो सिर्फ गैस दहकी है, लेकिन असली खतरा पेट्रोल और डीजल को लेकर है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार की तपिश और बढ़ी, तो डीजल के दाम बढ़ते ही सब्जी, दाल और राशन सब कुछ महंगा हो जाएगा। ट्रांसपोर्ट महंगा हुआ नहीं कि आम आदमी की पहुंच से हर चीज़ बाहर हो जाएगी।
इजरायल युद्ध का बहाना देकर तेल कंपनियों और सरकारों ने अपना काम शुरू कर दिया है। तमाशा सात समंदर पार हो रहा है, लेकिन उसकी कीमत हमारी रसोई चुका रही है। सरकारें सुरक्षा के दावे चाहे जितने कर लें, पर जब तक सिलेंडर के दाम और ये 25 दिन की वेटिंग कम नहीं होती, तब तक आम आदमी के लिए ‘अच्छे दिन’ सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।
धमाका हो चुका है, बस अब ये देखना है कि ये आग और कितनी दूर तक जाएगी।
पहाड़ से लेकर मैदान तक, आज हर चूल्हा महंगाई की इस बेतुकी मार से सुलग रहा है। शासन-प्रशासन को इस ‘बैकलॉग’ और बढ़ती कीमतों पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।”



