व्यंग्यसंपादकीय

बधाई हो! अब विधानसभा में गूंजेगी शहनाई: लोकतंत्र के मंदिर को बैंकट हॉल बनाने की तैयारी

सदन में शहनाई, जनभावना की विदाई:

चौखट से चर्चा  𝐔𝐊𝐂𝐲𝐛𝐞𝐫𝐍𝐞𝐰𝐬 𝐄𝐱𝐜𝐥𝐮𝐬𝐢𝐯𝐞

 

​उत्तराखंड के राजनैतिक गलियारों से एक बेहद ‘क्रांतिकारी’ विचार निकला है। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने सुझाव दिया है कि गैरसैण (भराड़ीसैण) के भव्य विधानसभा भवन को अब ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ और ‘कॉर्पोरेट इवेंट्स’ के लिए किराए पर दिया जाए। वाकई, क्या गजब की सोच है! जिस भवन को हम ‘पहाड़ की अस्मिता’ और ‘शहीदों का सपना’ समझकर पूजते रहे, उसे सरकार अब ‘मुनाफे का सौदा’ बनाने की राह पर है।

शानदार आइडिया: अब तारीख पर होगा फैसला

​सोचिए, जिस सदन में कभी पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे ‘नीरस’ विषयों पर चर्चा होती थी, वहां अब “आज मेरे यार की शादी है” जैसे गीतों पर डीजे बजेगा। माननीय मंत्री जी का तर्क है कि इससे भवन का रखरखाव होगा। तो क्या कल को हम सचिवालय को ‘होम-स्टे’ और राजभवन को ‘शूटिंग सेट’ बनाने का भी विचार करेंगे?

​राजधानी के मुद्दे पर तो हम सालों से ‘तारीख पे तारीख’ दे रहे थे, अब अच्छा है कि उसी परिसर में लोग अपनी ‘शादी की तारीख’ तय करेंगे। कम से कम इसी बहाने वीआईपी सड़कों पर धूल तो कम होगी!

एक छोटा सा सुझाव और भी है…

​जब हम इतनी प्रगतिशील सोच रख रहे हैं कि सरकारी संपत्तियों का ‘मल्टी-परपज’ इस्तेमाल हो, तो एक और सुधार की जरूरत महसूस होती है। एक जिम्मेदार टैक्सपेयर के नाते मन में सवाल आता है कि जैसे 60 साल की उम्र के बाद सरकारी कर्मचारी को ‘विश्राम’ दे दिया जाता है, क्या वैसे ही नियम हमारे नेताओं पर लागू नहीं होने चाहिए?

​अगर 60 साल के बाद कोई व्यक्ति सरकारी कुर्सी के लिए ‘रिटायर’ माना जाता है, तो माननीय सांसद और विधायकों को भी 60 की उम्र पार करते ही राजनीति से ‘अनिवार्य रिटायरमेंट’ ले लेना चाहिए। जब हम सदन को ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ बनाकर युवाओं को रोजगार (कैटरिंग या टेंट में ही सही) देने की सोच रहे हैं, तो क्यों न 60 साल से ऊपर के नेताओं को भी ‘मार्गदर्शक’ बनाकर युवाओं के लिए सदन की कुर्सियां खाली कर दी जाएं?

आखिरी चोट

​पहाड़ की जनता ने गैरसैण इसलिए मांगा था ताकि वहां से उनकी किस्मत के फैसले हों, न कि वहां किसी रसूखदार की बारात का स्वागत हो। अगर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर को ‘इवेंट सेंटर’ ही बनाना था, तो फिर शहीदों ने शहादत क्यों दी?

​उम्मीद है कि सरकार ‘राजस्व‘ और ‘राजधानी‘ के बीच का अंतर समझेगी। वरना इतिहास गवाह है, जब सदन की मर्यादा बाजार के हवाले होती है, तो जनता फिर अपना ‘फैसला’ सुनाने में देर नहीं लगाती।

डिस्क्लेमर:

यह लेख एक व्यंग्यात्मक विश्लेषण है, जिसका उद्देश्य जनभावनाओं और वर्तमान राजनीतिक बयानों के विरोधाभास को उजागर करना है।

UK Cyber News

Prem Padiyar

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Report By UK Cyber News