भारत ने अमेरिका का फायदा उठाया या अपने हितों की रक्षा की?
ट्रम्प के बयान पर उठते सवाल

संपादकीय,
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह बयान कि “भारत ने दशकों तक अमेरिका का फायदा उठाया” एक बार फिर वैश्विक व्यापार और कूटनीति के बीच मौजूद उस खींचतान को सामने ले आया है, जो अक्सर मित्रता की मुस्कान के पीछे छिपी रहती है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं, दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बताते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत की व्यापारिक नीतियों को अमेरिका के लिए नुकसानदेह करार देते हैं।
सवाल यह है कि क्या वास्तव में भारत ने अमेरिका का फायदा उठाया, या फिर भारत ने वही किया जो हर संप्रभु राष्ट्र अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए करता है?
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका लंबे समय से मुक्त व्यापार की वकालत करता रहा है, लेकिन जब बात उसके अपने उद्योगों, किसानों और कंपनियों की आती है तो वही अमेरिका टैरिफ, प्रतिबंध और संरक्षणवादी नीतियों का सहारा लेने से भी नहीं हिचकता। ऐसे में यदि भारत अपने करोड़ों किसानों, लघु उद्योगों और घरेलू बाजार की सुरक्षा के लिए कुछ आयात शुल्क बनाए रखता है, तो क्या उसे “फायदा उठाना” कहा जाना चाहिए?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध कोई दान या एहसान पर आधारित नहीं हैं। दोनों देशों को एक-दूसरे से लाभ मिलता है। अमेरिकी कंपनियों को भारत जैसा विशाल बाजार मिलता है, जबकि भारतीय उद्योगों को अमेरिकी बाजार तक पहुँच का अवसर मिलता है। ऐसे में यह रिश्ता बराबरी के हितों का है, न कि किसी एक पक्ष की उदारता का।
वर्तमान विवाद का केंद्र कृषि और टैरिफ हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी बाजार को अधिक खोले। लेकिन भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने करोड़ों किसानों की आजीविका को कैसे सुरक्षित रखे। क्या केवल व्यापारिक समझौते के लिए भारत अपने ग्रामीण अर्थतंत्र को जोखिम में डाल सकता है? यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है।
दूसरी तरफ भारत की अपेक्षा है कि अमेरिका भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों पर लगने वाले शुल्कों में राहत दे। यानी दोनों पक्ष अपने-अपने हितों की रक्षा करना चाहते हैं। ऐसे में किसी एक देश को दोषी ठहराना वास्तविकता का सरलीकरण होगा।
ट्रम्प का बयान एक और सवाल खड़ा करता है। यदि भारत इतना ही “फायदा” उठा रहा था, तो फिर अमेरिका लगातार भारत के साथ बड़े व्यापारिक समझौते की कोशिश क्यों कर रहा है? क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं है कि भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में इतना महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुका है कि उसे नजरअंदाज करना संभव नहीं?
भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती की असली परीक्षा अब व्यापारिक मैदान में है। आने वाले महीनों में होने वाली वार्ताएँ तय करेंगी कि दोनों देश दबाव की राजनीति से आगे बढ़कर संतुलित समझौते तक पहुँच पाते हैं या नहीं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है,
क्या भारत अमेरिका का फायदा उठा रहा था, या फिर एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा था? और क्या वैश्विक व्यापार में बराबरी का दावा करने वाला भारत कुछ शक्तिशाली देशों को असहज कर रहा है?
संपादकीय डेस्क: ukcybernews



