एक शिक्षिका का इंतजार और खाली पड़ी स्कूल- भविष्य कहाँ है?
एक पत्र जो पूरी व्यवस्था को आईना दिखा रहा है।

पौड़ी गढ़वाल:
आमतौर पर स्कूल की सुबह बच्चों की किलकारियों, प्रार्थना की धुन और नई उम्मीदों के साथ शुरू होती है। लेकिन यमकेश्वर ब्लॉक के राजकीय प्राथमिक विद्यालय, नौद (संकुल गैण्डखाल) की सुबह इन दिनों एक गहरी खामोशी में डूबी है। यहाँ न तो घंटी बजती है और न ही डेस्क पर बच्चों के बस्ते रखे जाते हैं।
विद्यालय की प्रधानाध्यापिका सुमन असवाल द्वारा बी.ई.ओ. (खंड शिक्षा अधिकारी) को लिखा गया 20 अप्रैल 2026 का एक पत्र, सिर्फ एक सरकारी पत्राचार नहीं, बल्कि हमारे पहाड़ों से हो रहे पलायन और शिक्षा व्यवस्था के बिखराव का एक काला दस्तावेज़ है।

सन्नाटे में सिमटी एक शिक्षिका की व्यथा
इस पत्र में जो दर्द झलकता है, वह किसी का भी दिल पसीज देने वाला है। शिक्षिका ने बहुत उम्मीद के साथ लिखा था कि गांव के प्रधान और ग्रामीणों ने आश्वासन दिया था कि 20 अप्रैल तक कम से कम दो बच्चे नामांकन के लिए आएंगे। एक शिक्षिका, जो शायद उन दो बच्चों के भविष्य को संवारने के सपने बुन रही थी, आज खाली बेंचों को देख रही है।
तारीख बीत गई, वादा पूरा नहीं हुआ और आज स्थिति यह है कि विद्यालय में एक भी छात्र/छात्रा उपलब्ध नहीं है। यह पत्र केवल नामांकन की शून्य संख्या नहीं, बल्कि उन ग्रामीण क्षेत्रों की हकीकत है जहाँ स्कूल की इमारतें तो खड़ी हैं, लेकिन बच्चे नदारद हैं।
क्या हम अपनी संस्कृति और जड़ों को खो रहे हैं?
यह केवल एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि उस ‘पलायन’ का परिणाम है जिसने हमारे गांव के गांवों को खाली कर दिया है। जब गांव के प्रधान और ग्रामीण बच्चों के नामांकन का वादा पूरा नहीं कर पाते, तो कहीं न कहीं हम यह समझ सकते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का संकट कितना गहरा है। लोग काम की तलाश में शहरों की ओर रुख कर चुके हैं, और पीछे छूट गए हैं, वीरान घर, खाली खेत और ये खामोश सरकारी स्कूल।
सरकारी तंत्र से बड़ा सवाल
प्रधानाध्यापिका ने अंत में ‘दिशा-निर्देश’ मांगे हैं। लेकिन, क्या निर्देश से बच्चे वापस आ जाएंगे? क्या कागजी कार्रवाई से स्कूलों में फिर से चहल-पहल शुरू होगी? यह पत्र उस सिस्टम के मुंह पर एक तमाचा है जो शिक्षा के अधिकार की बात तो करता है, लेकिन उन स्कूलों को बचाने में नाकाम रहा है जहाँ से कल का भविष्य तैयार होता था।
क्या हमारे पास इसका कोई जवाब है?
एक शिक्षक की मेहनत तब सार्थक होती है जब सामने विद्यार्थी हो। बिना छात्रों के स्कूल चलाने की विवशता एक शिक्षक के जज्बे को तोड़ देती है। अब समय आ गया है कि शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन इस पर केवल ‘पत्राचार’ न करे, बल्कि जमीनी हकीकत को समझे।
UK Cyber News समाज से पूछता है: अगर स्कूलों में बच्चे ही नहीं रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों और अपनी भाषा से कैसे जुड़ेगी? यह पत्र सिस्टम पर सवाल है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल हम पर है। क्या हम सिर्फ व्हाट्सएप,फेसबुक पर पोस्ट शेयर करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे? या फिर इन स्कूलों को फिर से गुलजार करने के लिए कभी पीछे मुड़कर अपनी मिट्टी की ओर देखेंगे?



