राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025: हरित और सुंदर उत्तराखंड का सूपड़ा साफ,42 विजेताओं में एक भी पंचायत शामिल नहीं!

देहरादून/नई दिल्ली:
केंद्र सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा ‘राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार 2025’ (NPA-2025) की घोषणा कर दी गई है। आगामी 3 जून 2026 को नई दिल्ली में देश भर की 42 उत्कृष्ट पंचायतों को करोड़ों रुपये के वित्तीय इनाम के साथ सम्मानित किया जाएगा। लेकिन इस सूची ने उत्तराखंड के नीति-नियंताओं और पंचायती राज व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की चमकती सूची में उत्तराखंड की एक भी पंचायत अपनी जगह नहीं बना पाई है।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जो राज्य अपनी ‘हरित’ वादियों, पहाड़ों और ग्रामीण संस्कृति के लिए जाना जाता है, वह सतत विकास (Sustainable Development) के 9 पैमानों में से किसी एक में भी देश के टॉप-3 में जगह नहीं बना सका।

कर्नाटक और पड़ोसी राज्य मार गए बाजी, उत्तराखंड फिसड्डी
इस बार के पुरस्कारों में कर्नाटक ने सबसे ज्यादा 6 पुरस्कार झटके हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और ओडिशा ने 5-5 पुरस्कारों पर कब्जा जमाया है। वहीं छोटे पहाड़ी राज्यों की बात करें, तो सिक्किम, त्रिपुरा, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों की पंचायतों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन कर करोड़ों की इनामी राशि जीती है। हिमाचल प्रदेश जैसी समान भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य ने भी दो श्रेणियों में पुरस्कार हासिल किए हैं, लेकिन उत्तराखंड का खाता तक नहीं खुला।
इन 9 थीमों पर खरी नहीं उतरीं हमारे राज्य की पंचायतें
विजेताओं का चयन ‘Panchayat Advancement Index (PAI) 2.0’ के स्कोर और सतत विकास लक्ष्यों (LSDGs) के 9 मुख्य विषयों के आधार पर किया गया था:
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गरीबी मुक्त और उन्नत आजीविका
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स्वस्थ पंचायत
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बाल-अनुकूल पंचायत
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जल-पर्याप्त पंचायत
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स्वच्छ और हरित पंचायत (Green Panchayat)
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आत्मनिर्भर बुनियादी ढांचा
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सामाजिक रूप से सुरक्षित पंचायत
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सुशासन वाली पंचायत
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महिला-अनुकूल पंचायत
दुख की बात यह है कि ‘स्वच्छ और हरित पंचायत’ तथा ‘जल-पर्याप्त पंचायत’ जैसी श्रेणियां, जो उत्तराखंड के मूल स्वभाव से मेल खाती हैं, उनमें भी हमारे यहां की पंचायतें पिछड़ गईं।
करोड़ों के वित्तीय प्रोत्साहन से चूका उत्तराखंड
इन पुरस्कारों के तहत विजेता पंचायतों को 50 लाख रुपये से लेकर 5 करोड़ रुपये तक की भारी-भरकम राशि विकास कार्यों के लिए दी जा रही है। त्रिपुरा के सिपाहीजाला जिला पंचायत को जहां ₹5 करोड़ मिले हैं, वहीं कई ग्राम पंचायतों को ₹1-1 करोड़ का इनाम मिला है। उत्तराखंड की पंचायतों के इस रेस से बाहर होने के कारण राज्य को करोड़ों रुपये के इस केंद्रीय फंड से भी हाथ धोना पड़ा है।
आत्मचिंतन का समय: आखिर कमी कहां रह गई?
यह स्थिति तब है जब उत्तराखंड सरकार लगातार ‘होमस्टे योजना’, ‘डिजिटल पंचायत’ और ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े दावे करती है। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह पिछड़ना यह साफ संकेत देता है कि:
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क्या जमीनी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन सही से नहीं हो रहा है?
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क्या हमारी पंचायतों को इस राष्ट्रीय स्तर के कंपटीशन के लिए सही तरीके से तैयार (Data Documentation) नहीं किया गया?
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क्या अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की कमी है?



