
पौड़ी/देहरादून:
उत्तराखंड का शांत और खूबसूरत हिल स्टेशन ‘लैंसडौन’ इन दिनों अपनी वादियों की शांति के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े सियासी और सामाजिक विवाद के कारण चर्चा में है। ब्रिटिश वायसराय के नाम पर बसे इस शहर का नाम बदलकर ‘जसवंतगढ़’ करने के प्रस्ताव ने स्थानीय लोगों और व्यापारियों के बीच विरोध की लहर पैदा कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में हुई छावनी परिषद (Cantonment Board) की बैठक में लैंसडौन का नाम बदलकर 1962 के युद्ध नायक शहीद बाबा जसवंत सिंह रावत के नाम पर ‘जसवंतगढ़’ रखने का प्रस्ताव पारित किया गया। केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय को भेजे गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य गुलामी के प्रतीकों को हटाकर भारतीय वीरों को सम्मान देना है।
वीडियो साभार: amarujalauttrakhand.
व्यापारियों में भारी आक्रोश, बाजार बंद कर जताया विरोध
प्रस्ताव की खबर लगते ही लैंसडौन के व्यापारियों ने मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय व्यापार मंडल के नेतृत्व में बाजार बंद रखकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया गया।
विरोध के मुख्य कारण:
- ग्लोबल पहचान का नुकसान: व्यापारियों का तर्क है कि ‘लैंसडौन’ एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बन चुका है। गूगल सर्च से लेकर ट्रेवल गाइड तक लोग इसी नाम से यहाँ आते हैं। नाम बदलने से पर्यटन उद्योग पूरी तरह चरमरा सकता है।
- विकास की अनदेखी: स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर को नाम बदलने की नहीं, बल्कि बेहतर सड़कों, पार्किंग और पानी की सुविधाओं की जरूरत है।
- सैनिकों का सम्मान अलग, पर्यटन अलग: लोगों का कहना है कि वे शहीद जसवंत सिंह रावत का सर्वोच्च सम्मान करते हैं, लेकिन शहर की ऐतिहासिक पहचान बदलना इसका सही तरीका नहीं है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग
इंटरनेट पर भी यह मुद्दा दो धड़ों में बंट गया है। एक पक्ष इसे ‘स्वराज’ और ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ से मुक्ति बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे पर्यटन के लिहाज से आत्मघाती कदम मान रहा है।
लैंसडौन सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि ‘गढ़वाल राइफल्स’ की आन-बान-शान और उत्तराखंड के पर्यटन का एक प्रमुख स्तंभ है। शहीद जसवंत सिंह रावत की वीरता निर्विवाद है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी स्थापित पर्यटन स्थल की पहचान बदलकर ही सम्मान दिया जा सकता है? सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर स्थानीय जनता और व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखकर ही कोई अंतिम फैसला लेना होगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, उत्तराखंड


