नंदा देवी राजजात पर स्थगन की चर्चा,आस्था बनाम व्यवस्था की बहस तेज
2026 की बजाय 2027 में यात्रा की अटकलों से देवभूमि में असंतोष, परंपरा से छेड़छाड़ का आरोप

देहरादून | विशेष संवाददाता
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2026 में प्रस्तावित नंदा देवी राजजात यात्रा को स्थगित कर 2027 में आयोजित करने पर विचार किया जा रहा है। इस सूचना के सामने आते ही नंदानगर, बधाण और आसपास के क्षेत्रों में नाराज़गी और सवाल दोनों तेज़ हो गए हैं।
स्थानीय श्रद्धालुओं और परंपरा से जुड़े जानकारों का कहना है कि नंदा देवी राजजात कोई सामान्य आयोजन नहीं, बल्कि हर 12 वर्षों में संपन्न होने वाला धार्मिक विधान है, जिसे टालना आस्था में सीधा हस्तक्षेप माना जाएगा।
12 साल की परंपरा, तय वर्ष 2026
इतिहास के अनुसार नंदा देवी राजजात पिछली बार 2014 में संपन्न हुई थी, जबकि उससे पहले 2000 में यात्रा निकाली गई थी। इसी क्रम में वर्ष 2026 परंपरागत रूप से निर्धारित वर्ष माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तय चक्र में बदलाव का कोई ऐतिहासिक या धार्मिक आधार नहीं है।
राजा भी आयोजक नहीं, केवल सहभागी इतिहासकारों और नंदाभक्तों के अनुसार, राजा भी इस यात्रा का स्वामी या निर्णायक नहीं होता, बल्कि केवल सहयात्री होता है।
ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब राजा किसी कारणवश यात्रा में सम्मिलित नहीं हुआ, लेकिन राजजात कभी बाधित नहीं हुई।
इस पृष्ठभूमि में यात्रा की तिथि बदलने की चर्चा ने राजा और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘माँ की यात्रा किसी फ़ाइल से तय नहीं होती’
नंदानगर और बधाण क्षेत्र के लोगों का कहना है कि माँ नंदा का मायके से ससुराल जाना किसी विभागीय निर्णय या सुविधा के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
श्रद्धालुओं का स्पष्ट कहना है कि यदि कोई व्यक्ति या व्यवस्था यात्रा से पीछे हटती है, तो वह उसका निजी निर्णय होगा, लेकिन आस्था और परंपरा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
श्रद्धालुओं का साफ़ संदेश
नंदाभक्तों के अनुसार, यदि माँ नंदा की यात्रा का समय 2026 निर्धारित है, तो राजजात 2026 में ही संपन्न होनी चाहिए।
उनका कहना है कि यह यात्रा
न किसी सत्ता का आयोजन है,
न किसी प्रशासनिक योजना,
बल्कि सदियों से चली आ रही श्रद्धा और परंपरा का महापर्व है।
अब बड़ा सवाल
क्या देवभूमि में धार्मिक यात्राएँ भी अब अनुमति और सुविधाओं की मोहताज होंगी?
क्या आस्था को प्रशासनिक कैलेंडर के अनुसार बदला जा सकता है?
इन सवालों के बीच एक बात स्पष्ट रूप से कही जा रही है।
आस्था को टाला नहीं जाता और परंपरा बदली नहीं जाती।


