“कागज़ी रेस्टोरेंट से लूटा सरकारी पैसा — विजिलेंस की दहलीज़ पर वन निगम”
वन विकास निगम में "कागज़ी रेस्टोरेंट" से बिल! सरकारी खजाने पर बड़ा खेल बेनक़ाब

देहरादून/हल्द्वानी:-
वन विकास निगम में सरकारी खजाने को फर्जी बिलों के सहारे उड़ाने का मामला सामने आया है। हैरानी की बात ये है कि बिल एक ऐसे रेस्टोरेंट के नाम पर बने है,जो असल में शहर में मौजूद ही नहीं है। यानी कागज़ पर रेस्टोरेंट कागज़ पर बिल — और पैसा असली वाला!
अब इस पूरे प्रकरण की फाइल विजिलेंस तक पहुँच चुकी है और जांच सौंपने की तैयारी चल रही है।
शिकायत और एफिडेविट ने खोली परतें :-
मामला तब खुला जब एक शिकायतकर्ता ने एफिडेविट और बिल की कॉपी लगाकर विजिलेंस को जानकारी दी।
विजिलेंस ने तत्काल शासन को पत्र भेजा और शासन ने खाद्य सुरक्षा विभाग से संबंधित रेस्टोरेंट का रिकॉर्ड माँगा।जवाब साफ था – ऐसा कोई रेस्टोरेंट हल्द्वानी में है ही नहीं।
जांच में चौंकाने वाले तथ्य :-
सतर्कता अधीक्षक देहरादून की ओर से की गई प्रारंभिक जांच में जो सामने आया, उसने विभाग से लेकर शासन तक सबके कान खड़े कर दिए।
निगम के कुछ अधिकारियों ने मिलकर फर्जी रेस्टोरेंट के नाम पर बिल तैयार किए।
वही बिल लगाकर भुगतान लेने की कोशिश की गई।
खाद्य सुरक्षा विभाग ने भी साफ कहा—रेस्टोरेंट न रजिस्टर्ड है, न रिकॉर्ड में, न शहर में।
यानी खाना कागज़ पर परोसा गया… और पैसे असल में पचाए गए!
व्यंजन भी कागज़ी निकले :-
बिल में जो शाकाहारी व्यंजन लिखे गए थे, उनकी पुष्टि के लिए जब खाद्य सुरक्षा विभाग से जानकारी माँगी गई, तो जवाब आया—“भैया, पहले रेस्टोरेंट तो हो!”
इससे साफ हो गया कि पूरा बिल सिर्फ “बनाया हुआ खेल था”
शासन सख्त, एक सप्ताह में रिपोर्ट तलब :-
शासन ने वन विभाग से एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसमें यह साफ करना होगा, किस अधिकारी ने क्या भूमिका निभाई? किसने दस्तावेज़ फर्जी तैयार किए? किस स्तर पर लापरवाही या जानबूझकर भ्रष्टाचार हुआ? साथ ही शासन ने साफ चेतावनी दी है, आरोप सच मिले तो FIR और कड़ी कार्रवाई तय है। प्रथम दृष्टया इस मामले में बीएनएस की धाराएँ 316, 335, 336, 338, 339 और 61 के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का उल्लंघन सामने आ रहा है। बड़ा झटका, कई बड़े नाम जांच के घेरे में वन विकास निगम हल्द्वानी में हुए इस फर्जी बिल कांड ने बड़ा रूप ले लिया है। शासन ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में कई बड़े नाम जांच के दायरे में आ सकते हैं। सरकारी फाइलों में सब कुछ मिलता है—बस सच्चाई ही अक्सर गायब रहती है। और इस बार गायब रेस्टोरेंट ने ही पूरी कहानी खोल दी।


