हरीश रावत का ब्राह्मण कार्ड डूबती कांग्रेस को बचा पायेगा?
UKCYBERNEWS Report

2027 के विधानसभा चुनाव तैयारी मे लग चुकी भाजपा की डबल इंजन सरकार सुबह से शाम तक मजार, मस्जिद, मदरसा, डेमोग्राफी चेंज, थूक जिहाद, लव जिहाद, लैंड जिहाद, नकल जिहाद पर वीडियो जारी कर हरीश रावत पर सैकड़ों वीडिओ बनाकर उन्हें मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कुलपति और कुलाधिपति घोषित करने में लगी हुई है, उस दौर मे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता हरीश रावत द्वारा कांग्रेस संगठन में ब्राह्मणों को बड़ी पोस्ट उचित गद्दी उचित पद देने की मांग का मामला खूब जोर-जोर से चल रहा है, हरीश रावत की इस चमत्कारी मांग पर बचे खुचे कांग्रेसी आपस में लड़ भी रहे हैं, हरीश रावत के इस ब्राह्मण प्रेम पर उनके सगे साले करण माहरा का कहना है कि कांग्रेस ने नारायण दत्त तिवारी से लेकर विजय बहुगुणा और किशोर उपाध्याय जैसे ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ पदों पर बिठाया है ये दूसरी बात है कि यह तीनों लोग कांग्रेस की पीठ पर छूरा घोपकर भाजपा में चले गए।
हरीश रावत की यह चिंता उस दौर में है जब वह खुद प्रीतम सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए जबरदस्त फील्डिंग लगाये हुए हैं, यह बात कांग्रेसियों को मालूम है कि एक समय जब राहुल गांधी प्रीतम सिंह को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने का मन बना चुके थे तो हरीश रावत और किशोर उपाध्याय ने प्रीतम सिंह को 2% जनजाति का नेता साबित कर उनका पत्ता साफ करवा दिया था की जनजाति के नेता को मुख्यमंत्री बनाने से कांग्रेस खत्म हो जाएगी।
2027 की चुनाव में उतरने के लिए कांग्रेस पार्टी के पास विधायक गणेश जोशी सौरव बहुगुणा संजय डोभाल किशोर उपाध्यय अनिल नौटियाल आशा नौटियाल विनोद चमोली उमेश शर्मा काऊ बृजभूषण गैरोला मदन कौशिक बंशीधर भगत अरविंद पांडे के सामने लड़वाने के लिये प्रत्याशी ही नहीं मिल पा रहे।
प्रत्याशियों का यह टोटा इसलिए बढ़ गया क्योंकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जब कांग्रेसी भाजपा में जा रहे थे तो माहरा हंस हंस कर कहते थे जिसे कल जाना है वह आज ही चला जाए।
महारा के इस बयान के बाद तो कांग्रेस में भाग मिल्खा भाग वाली रेस इतनी तेज हुई कि आज 70 में से 35 सीटों पर मशाल, टॉर्च, लालटेन, ट्यूबलाइट से भी प्रत्याशी नहीं मिल पा रहे हैं. देखना है कि सरकार के डेमोग्राफी चेंज और तमाम जिहादों के बयान के बीच हरीश रावत का यह ब्राह्मण कार्ड कितना कारगर साबित होता है।
एक तरफ प्रदेश में तीसरे मोर्चे की रेस में बहुत से दल दिख रहे है, जिसमें अभी तक यूकेडी और उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा आस पास ही नजर आ रहे है। तीसरे मोर्चे के इन दलों ने पीपर लीक, बढ़ती बेरोजगारी हो या लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाप सरकार की नाक में दम कर रखा है। पिछले दिनों हुए पेपर लीक प्रकरण में धरने पर बैठे यूकेडी तथा उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा समर्थित बेरोजगार संघ के युवकों को शांत करने के लिए आनन फानन में मुख्यमंत्री जी को धरना स्थल पर पहुंचकर उनकी सभी मांगों को मानकर शांत कराना पड़ा, जबकि 8 से 10 दिन चले इस धरना प्रदर्शन में बैठे इन युवाओं को बीजेपी और सरकार में बैठे हुक्मरानों ने अलग अलग उपाधियों से नवाजा था। जिसमें मुख्य रूप से कहा गया ये अनपढ़ है, देश विरोधी है, टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग है, भगवा विरोधी लोग है यहां तक कि माओवादी और जेहादी की उपाधि भी दी गई।
लोकतंत्र में तो जनता ही निर्णायक होती है देखने वाली बात यह होगी कि 2027 के विधान सभा चुनाव में किसके सर ताज रहेगा। सोशल मीडिया की माने तो उत्तराखण्ड की जनता की मांग third front की है। भाजपा/ कांग्रेस/यूकेडी/अन्य दल ज्यों ज्यों चुनाव नजदीक आते जाएंगे मुकाबला त्रिशंकु और रोचक बनता जाएगा।


