
देहरादून (नकरौंदा): कहते हैं कि “दीये तले अंधेरा होता है”, और यह कहावत आज उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में चरितार्थ हो रही है। विधानसभा से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नकरौंदा के एक कर्मठ किसान अर्जुन सिंह गुनियाल की आँखों में आज आंसू नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति दहकता हुआ अंगारा है।
महीनों की मेहनत,चंद घंटों में खाक
अर्जुन सिंह गुनियाल कोई साधारण किसान नहीं हैं। उनका परिवार पिछली कई पीढ़ियों से इस मिट्टी को अपने पसीने से सींचता आ रहा है। आज के दौर में जहाँ लोग राजधानी के आसपास की कीमती जमीनों को बेचकर फैक्ट्रियां लगा रहे हैं या करोड़ों के ‘प्रॉपर्टी डीलर’ बनकर बैठ गए हैं, वहीं अर्जुन सिंह ने अपनी पैतृक खेती को जीवित रखा। उन्होंने जमीन नहीं बेची, बल्कि हमें अन्न देने का संकल्प जारी रखा। लेकिन आज उनकी उसी 6 महीने की मेहनत को बेमौसम बारिश ने जमींदोज कर दिया है।
कटाक्ष: विधायक जी को मिठाई प्यारी, किसान की तबाही नहीं
किसान का सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिस समय उनकी फसल सड़ रही है, उसी समय क्षेत्र के माननीय विधायक जी मात्र 4 किलोमीटर की दूरी पर एक ‘मिष्ठान भंडार’ का उद्घाटन कर रहे हैं।
किसान का तीखा सवाल: “मिठाई की दुकान का फीता काटने का समय है, फोटो खिंचवाने का समय है, लेकिन क्या 4 किमी दूर अपने क्षेत्र के इस अन्नदाता के आंसू पोंछने का समय नहीं है?”
वीडियो के कड़े बोल: शर्म करो,हम हाथ-पैर तोड़ना भी जानते हैं
वीडियो में अर्जुन सिंह का आक्रोश चरम पर है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि शासन-प्रशासन के अधिकारी केवल कागजों पर ‘किसान हितैषी’ बनते हैं।
“शासन-प्रशासन की आँखें मर चुकी हैं। अगर बगल के खेत में फसल खड़ी न होती, तो मैं अपनी इस बर्बाद फसल को आग लगा देता। हम किसान अगर खेत जोतना जानते हैं, तो अपना हक छीनना और हाथ-पैर तोड़ना भी जानते हैं। क्या हमारी आय ऐसे ही दोगुनी होगी?”
राजधानी में यह हाल,तो पहाड़ का क्या?
यह सिर्फ एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, यह समूचे क्षेत्र के किसानों का अपमान है। अर्जुन सिंह जैसे किसान चाहते तो कब का खेती छोड़कर किसी और व्यवसाय में लग जाते और दूसरों के उगाए अन्न पर निर्भर रहते, लेकिन उन्होंने मिट्टी की सेवा चुनी।
UK Cyber News का सवाल: अगर राजधानी की नाक के नीचे, शासन की चौखट से चंद कदमों की दूरी पर किसान की यह अनदेखी हो रही है, तो कल्पना कीजिए उन दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाले किसानों की क्या स्थिति होगी? क्या धामी सरकार के अधिकारी केवल ‘एसी कमरों’ में बैठकर सर्वे करेंगे या धरातल पर आकर इस कर्मठ किसान का हाथ थामेंगे?
डिस्क्लेमर:-
खबर में दिखाए गए वीडियो में किसान का आक्रोश उनकी बर्बाद फसल और व्यवस्था की अनदेखी से उपजा एक भावनात्मक गुबार है। प्रस्तुत तीखे कटाक्ष और शब्द पीड़ित किसान की अपनी पीड़ा हैं, जिनका उद्देश्य किसी की भावनाएं आहत करना नहीं बल्कि शासन-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाना है। UK Cyber News केवल जनसरोकारों की आवाज़ को मंच प्रदान कर रहा है।
(UK Cyber News)


