
देहरादून/चमोली।
उत्तराखंड की विश्वविख्यात और आस्था, संस्कृति तथा लोकजीवन की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में शामिल माँ नंदा देवी राजजात यात्रा-2026 की तैयारियां अब प्रशासनिक स्तर पर भी तेज होती दिखाई दे रही हैं। उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (UTDB) ने 29 जुलाई 2026 को गढ़वाल मंडल आयुक्त को एक महत्वपूर्ण पत्र भेजकर यात्रा के सफल, सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित संचालन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं समय रहते सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है।

पर्यटन विभाग के सचिव एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल की ओर से जारी इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सितंबर 2026 में प्रस्तावित इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
क्या कहा गया है पत्र में?
उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद द्वारा जारी पत्र के अनुसार, राज्य सरकार ने पूर्व में जारी अधिसूचना के तहत उत्तराखंड धर्मस्व एवं तीर्थाटन परिषद का गठन किया था। इसी व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न प्रमुख धार्मिक यात्राओं के संचालन के लिए समितियों का गठन किया गया है।
पत्र में उल्लेख है कि क्रियान्वयन, प्रबंधन एवं नियंत्रण समिति के अध्यक्ष के रूप में गढ़वाल मंडल आयुक्त को नामित किया गया है।
इसी क्रम में बताया गया है कि श्री नंदा देवी सिद्धपीठ मंदिर, कुरूड़ (जनपद चमोली) से निकलने वाली माँ नंदा देवी राजजात यात्रा 5 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक प्रस्तावित है।
पर्यटन विभाग का कहना है कि यह यात्रा उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्राओं में से एक है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुंचने की संभावना है।
मुख्यमंत्री को भी भेजा जा चुका है प्रस्ताव
पत्र के अनुसार, श्री नंदादेवी बड़ी जात आयोजन समिति, कुरूड़ द्वारा यात्रा आयोजन से संबंधित विस्तृत प्रस्ताव एवं प्रतिवेदन मुख्यमंत्री को भी भेजा जा चुका है।
इसी आधार पर पर्यटन विभाग ने मंडल आयुक्त से अनुरोध किया है कि संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सभी तैयारियां समय से पूरी कराई जाएं।
क्या है माँ नंदा देवी राजजात?
माँ नंदा देवी राजजात को उत्तराखंड की ‘हिमालयी महाकुंभ यात्रा’ भी कहा जाता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकआस्था, इतिहास और परंपरा का जीवंत स्वरूप है।
माँ नंदा देवी को उत्तराखंड में बेटी, बहन और शक्ति स्वरूपा देवी के रूप में पूजा जाता है। लोकमान्यता है कि राजजात यात्रा देवी नंदा की मायके से ससुराल अर्थात हिमालय स्थित कैलाश की प्रतीकात्मक विदाई यात्रा है।
इस यात्रा में हजारों श्रद्धालु कई दिनों तक कठिन पर्वतीय मार्गों से होकर हिमालयी क्षेत्रों की पदयात्रा करते हैं।
सदियों पुरानी परंपरा
इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार, नंदा देवी राजजात की परंपरा कई सदियों पुरानी मानी जाती है। समय-समय पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार यात्रा का स्वरूप बदलता रहा, लेकिन इसकी धार्मिक मान्यता आज भी उतनी ही मजबूत है।
यात्रा के दौरान पारंपरिक छंतोलियां, डोलियां, स्थानीय वाद्य यंत्र, लोकगीत, जागर और धार्मिक अनुष्ठान इस आयोजन को अद्वितीय बनाते हैं।
क्यों है यह यात्रा विशेष?
माँ नंदा देवी राजजात केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
इस यात्रा के माध्यम से-
- स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती है।
- पहाड़ी क्षेत्रों में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।
- स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलते हैं।
- होमस्टे, होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ती है।
- पारंपरिक लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
यात्रा का अधिकांश मार्ग दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों से होकर गुजरता है। ऐसे में प्रशासन के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां रहती हैं, जिनमें,
- सड़क और पैदल मार्ग की सुरक्षा
- स्वास्थ्य एवं मेडिकल सुविधाएं
- आपदा प्रबंधन
- संचार व्यवस्था
- पेयजल एवं स्वच्छता
- पुलिस एवं सुरक्षा व्यवस्था
- पार्किंग और यातायात नियंत्रण
- पर्यावरण संरक्षण
- कचरा प्रबंधन
पर्यटन विभाग का यह पत्र इसी दिशा में समय रहते समन्वय स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यात्रा का सफल संचालन होता है तो चमोली सहित आसपास के जिलों में पर्यटन गतिविधियों को नया प्रोत्साहन मिलेगा।
होटल व्यवसाय, टैक्सी संचालन, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र, पारंपरिक खाद्य पदार्थ और होमस्टे संचालकों को भी इसका लाभ मिलने की संभावना है।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का अवसर
उत्तराखंड सरकार लगातार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रही है। चारधाम यात्रा के साथ-साथ नंदा देवी राजजात जैसी पारंपरिक यात्राओं को बेहतर व्यवस्थाओं के साथ आयोजित करना राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ यात्रा की पारंपरिक गरिमा और धार्मिक मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होगा।
आगे क्या होगा?
अब गढ़वाल मंडल आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति विभिन्न विभागों के साथ बैठक कर यात्रा की तैयारियों की समीक्षा करेगी। इसके बाद जिला प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य, लोक निर्माण विभाग, पर्यटन, पेयजल, विद्युत, आपदा प्रबंधन सहित अन्य विभागों को आवश्यक जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी।
यदि सभी तैयारियां निर्धारित समय पर पूरी होती हैं तो सितंबर 2026 में होने वाली माँ नंदा देवी राजजात यात्रा श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुरक्षित, व्यवस्थित और सुविधाजनक साबित हो सकती है।


