मैं केदार हूँ
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कविता
मैं “केदार” हूँ…
।। मैं केदार हूँ।। वही, जिसके दरबार में हिमालय भी चरण छूकर खड़ा होता है, जहाँ हवाएँ मंत्रों का…
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।। मैं केदार हूँ।। वही, जिसके दरबार में हिमालय भी चरण छूकर खड़ा होता है, जहाँ हवाएँ मंत्रों का…
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