
।। मैं केदार हूँ।।
वही, जिसके दरबार में हिमालय भी चरण छूकर खड़ा होता है,
जहाँ हवाएँ मंत्रों का उच्चार करती हैं,
और हर पत्थर पर महादेव की चेतना स्पंदित होती है।
“मैं वह ज्योति हूं
जो तूफ़ानों में भी नहीं बुझती,
मैं वह मार्ग हूं…
जो टूटता नहीं, बस परखता है।
पहले मैं साधकों की परीक्षा लेता था,
फिर भक्त मेरी राह नापते थे,
और अब
मैं ही उन्हें खींच लाता हूं,
क्योंकि ज्वालाओं को शिखरों तक कौन रोक पाया है?
मेरी घाटियाँ नमन करवाती हैं,
मेरी चोटियाँ अहंकार गलाती हैं,
और मेरी धरा पर कदम रखते ही
मनुष्य देवत्व को छू जाता है।
मैं केदार हूं…
जहाँ आस्था हथियार बन जाती है,
और भक्ति कवच।
जहाँ कदम डगमगाते हैं
पर विश्वास कभी नहीं।
सारी शक्तियाँ मेरी चौखट पर जागृत रहती हैं
पंचतत्व मेरी सेवा में,
दिशाएँ मेरे प्रहरी,
और समय स्वयं मेरे द्वार पर रुककर सिर झुकाता है।
मैंने जलप्रलय देखा,
बिखराव देखा,
पर मैं टूटा नहीं
क्योंकि मैं शिव का घर हूं,
मैं विनाश में भी सृजन की पुकार हूं।
पहले लोग मुझे खोजते थे,
अब मैं ही पुकार बनकर उनके भीतर उतरता हूं।
मैं केदार हूं…
अडिग, अचल, अनादि
और जब महादेव चाहते हैं,
तो पत्थर भी मेरे द्वार पर जीवित हो उठते हैं।”
“ॐ” क्रों महाकाल-गुह्य-नाद,
भस्म-जिह्वा जगरंण स्वाहा।
अंतः स्थूलं दह-दह,
देह में देव, श्वास में शम्भु
जाग्रत् हो, जाग्रत् हो, जाग्रत् हो।।
🙏 दिनेश पंत की कलम से 🙏



