उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष इस साल एक गंभीर संकट बन गया है। इस वर्ष अब तक वन्यजीव हमलों में 45 लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 400 लोग घायल हुए हैं। ग्रामीणों के भारी आक्रोश और बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सरकार ने कई बड़े निर्णय लिए हैं।
विशेषज्ञों और वन विभाग ने इस साल संघर्ष बढ़ने के पीछे कुछ प्रमुख कारण बताए हैं:
इस साल भालुओं के शीतनिद्रा चक्र में बदलाव देखा गया है। तापमान बढ़ने के कारण वे समय से पहले सक्रिय और अधिक आक्रामक हो रहे हैं। खाली पड़े गांवों में झाड़ियाँ उगने से गुलदारों और भालुओं को छिपने के लिए सुरक्षित जगह मिल रही है, जिससे वे बस्तियों के और करीब आ गए हैं। गांवों और कस्बों के बाहर फेंका जा रहा कचरा वन्यजीवों को आकर्षित कर रहा है, जिससे उनका व्यवहार हिंसक हो रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में इन घटनाओं को रोकने के लिए कई घोषणाएं की हैं:
- वन्यजीव हमले में मृत्यु होने पर मिलने वाली अनुग्रह राशि को ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख कर दिया गया है।
- सरकार ने घोषणा की है कि हमले में घायल व्यक्ति के इलाज का पूरा खर्च अब राज्य सरकार वहन करेगी।
- बंदरों, लंगूरों और जंगली सूअरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए राज्य के सभी 13 जिलों में आधुनिक नसबंदी केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
- संघर्ष वाले ‘हॉटस्पॉट्स’ पर AI-आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जो जानवर के 200-400 मीटर के दायरे में आते ही ग्रामीणों को मोबाइल पर SMS अलर्ट भेज देंगे।
पौड़ी और चमोली जैसे जिलों में स्थिति सबसे अधिक तनावपूर्ण है। ग्रामीणों ने कई जगहों पर सड़क जाम कर वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन किया है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ आदमखोर घोषित किए गए जानवरों को पकड़ने में देरी हुई है। वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में स्कूली बच्चों और बुजुर्गों के लिए ‘फॉरेस्ट एस्कॉर्ट’ (वन कर्मियों की सुरक्षा में आवाजाही) की व्यवस्था भी शुरू की है।
वन विभाग ने सलाह दी है कि शाम के समय अकेले बाहर न निकलें और झाड़ियों वाले रास्तों पर चलते समय शोर मचाएं या समूह में चलें।



