एक तरफ आश्वासन का मरहम दूसरी तरफ मुकदमों की लाठी नर्सिंग आंदोलन पर सरकार का दोहरा खेल!
उत्तराखंड सरकार का यह कैसा इंसाफ?
समाधान या सिर्फ एक और राजनीतिक भूलभुलैया ?
देहरादून
उत्तराखंड में पिछले डेढ़ साल से चल रहा नर्सिंग बेरोजगारों का उग्र आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जिसे ‘समाधान’ और ‘पॉलिटिकल गेम’ दोनों ही चश्मों से देखा जा रहा है। परेड ग्राउंड में पानी की टंकी पर हाई-वोल्टेज दृश्यों और 22 दिनों के कड़े आमरण अनशन के बाद फिलहाल आंदोलन को 1 महीने के लिए स्थगित किया गया है। लेकिन सवाल वही है—क्या यह सरकार की टालमटोल नीति का हिस्सा है या वाकई युवाओं को इंसाफ मिलेगा?
मुलाकातों का दौर और आश्वासन का मायाजाल
आंदोलनकारियों के मुताबिक, सरकार और शासन स्तर पर उन्हें सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पिलाई गई। 12 दिसंबर 2025 को जब प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी, तो सीएम ने माना था कि “प्रदेश के बच्चों का इस तरह सड़कों पर बैठना बेहद दुखद है” और उन्होंने विभाग से प्रस्ताव आने पर सकारात्मक कार्यवाही का भरोसा दिया था।
लेकिन समय बीतने के साथ विभाग के सचिव बदल गए। नए सचिव ने भी माना कि पिछले 3-4 बैच के नर्सिंग युवाओं के साथ अन्याय हुआ है, परंतु धरातल पर कोई ठोस शासनादेश जारी नहीं हुआ और फाइलें अटकी रहीं।
22 दिनों का कड़ा अनशन और चरम पर प्रशासनिक संवेदनहीनता
शांतिपूर्ण धरने की जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो बेरोजगारों ने आमरण अनशन का रास्ता चुना। यह आंदोलन कितना संवेदनशील था, इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है:
- 22 दिनों तक लगातार युवाओं ने अन्न का एक दाना नहीं चखा।
- 12 आंदोलनकारी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए।
- 06 युवाओं की हालत इतनी बिगड़ी कि वे आईसीयू (ICU) में जिंदगी और मौत से लड़े।
एक महिला आंदोलनकारी का ब्लड प्रेशर (BP) गिरकर 80/40 तक पहुंच गया था और वे 6 दिनों तक अस्पताल में रहीं। इस गंभीर स्थिति के बावजूद शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता चरम पर रही।
नियमावली का खेल: हिमाचल मॉडल की आड़ और बाहरी डिग्रियों का झोल
स्वास्थ्य मंत्रियों के बदलने के साथ ही सरकार के तर्क भी बदलते चले गए। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत जहां वर्षवार (Batch-wise) भर्ती के पक्ष में थे और उन्होंने सचिव को पत्र भी लिखा था, वहीं नए स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के आते ही सुर बदल गए। मंत्री जी का तर्क है कि 70% डॉक्टर और हेल्थ डायरेक्टर इस नियमावली के खिलाफ हैं।
पॉलिसी में गोलमाल के मुख्य बिंदु:
- विवादित 1999 का प्रावधान: आंदोलनकारियों का सवाल है कि जब उत्तराखंड में ‘स्टेट ऑफ नर्सिंग’ का पहला बैच ही 2014 में आया, तो नियमावली में 1999 से दो बार छूट का प्रावधान क्यों जोड़ा गया? इसका सीधा फायदा उन लोगों को मिल रहा है जिन्होंने राज्य से बाहर रहकर ‘नॉन-अटेंडिंग’ डिग्रियां ली हैं और जिनके पास कोई क्लिनिकल अनुभव नहीं है।
- हिमाचल की तर्ज पर दोहरा मापदंड: जब सरकार ने हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर 10 बोनस अंक देने का राग अलापा, तो युवाओं ने करारा जवाब दिया—“अगर हिमाचल की नकल ही करनी है, तो वहां का सख्त ‘मूल निवास और भू-कानून’ भी उत्तराखंड में लागू किया जाए।”
प्रायोजित होने के आरोपों का करारा जवाब
प्रशासन द्वारा इस आंदोलन को ‘प्री-प्लान्ड’ या राजनीति से प्रेरित बताने की कोशिश की गई। इसके जवाब में आंदोलनकारियों ने तथ्य सामने रखे कि वे पिछले डेढ़ साल से सड़कों पर हैं और इस दौरान उन्होंने राज्य के 55 से अधिक विधायकों और कैबिनेट मंत्रियों (खजान दास, गणेश जोशी, विनोद चमोली, मदन कौशिक, आशा नौटियाल आदि) के लिखित समर्थन पत्र हासिल किए हैं। कोई भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि बिना सोचे-समझे समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करता।
दमनकारी नीतियां: पानी की टंकी का विवाद
परेड ग्राउंड में जब हताश होकर युवा पानी की टंकी पर चढ़े, तो पुलिस प्रशासन ने उन पर ‘आत्महत्या के प्रयास’ (Attempt to suicide) जैसी संगीन धाराओं में केस दर्ज कर दिया। यही नहीं, प्रशासन ने यह दुष्प्रचार भी किया कि आंदोलनकारियों ने शहर की पानी की सप्लाई ठप कर दी थी, जबकि तकनीकी रूप से पानी की सप्लाई नीचे से संचालित होती है न कि टंकी के ऊपर से।
1 महीने का अल्टीमेटम या सरकार का सेफ एग्जिट?
नर्सिंग युवाओं ने जनता के स्वास्थ्य और सामाजिक सरोकारों का हवाला देते हुए अपने कदम पीछे खींचे हैं और 1 महीने के लिए धरना स्थगित किया है। लेकिन इतिहास गवाह है कि उत्तराखंड में जब-जब आंदोलन स्थगित हुए हैं, सरकारें उन्हें ठंडे बस्ते में डाल देती हैं।
आंदोलनकारियों ने साफ कहा है कि वे खुद 2 साल का कड़ा अनुभव अनिवार्य करने की मांग कर रहे हैं, ताकि केवल क्वालिफाइड लोग ही सिस्टम में आएं। यदि 1 महीने के भीतर सरकार ने वर्षवार भर्ती की विसंगतियों को दूर नहीं किया, तो सभी क्षेत्रीय संगठनों और जन-सरोकार से जुड़े दलों के साथ मिलकर एक बड़ा जन-आंदोलन तय है। सरकार को यह टालमटोल और गोलमाल बहुत भारी पड़ने वाला है।



