औली में ‘लोकतंत्र’ दर्शक दीर्घा में,’अहंकार’ मंच पर?
राष्ट्रीय खेलों के आगाज पर प्रोटोकॉल की धज्जियां; क्या निर्वाचित जनप्रतिनिधि का सम्मान अब महज एक 'विकल्प' है?

औली। उत्तराखंड
देवभूमि की वादियों में जब राष्ट्रीय खेलों का उत्साह परवान चढ़ना चाहिए था, तब वहां की बर्फीली हवाओं में सत्ता की अनदेखी की कड़वाहट घुल गई। औली में जो हुआ, वह केवल एक ‘तकनीकी चूक’ नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रदर्शन है जो जनादेश से चुने गए प्रतिनिधियों को हाशिए पर धकेलने की आदी हो चुकी है।
घटनाक्रम: जब प्रोटोकॉल को ‘भूल’ का नाम दिया गया
आयोजन के पहले ही दिन प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया गया। क्षेत्र प्रमुख, जो पूरे क्षेत्र की जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें मंच पर वह स्थान और सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। मंच संचालन की सूचियों से एक निर्वाचित प्रतिनिधि का नाम गायब होना यह बताता है कि पर्दे के पीछे काम करने वाली व्यवस्था कितनी ‘असंवेदनशील’ हो चुकी है।
स्वाभिमान बनाम औपचारिकता
जब पार्षदों के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन की नींद खुली, तब तक देर हो चुकी थी। डैमेज कंट्रोल के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारी दौड़ते नजर आए, लेकिन क्षेत्र प्रमुख ने पद की गरिमा को व्यक्तिगत मान-मनुहार से ऊपर रखा।
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- मंच का बहिष्कार: उन्होंने दर्शक दीर्घा में बैठकर जनता के बीच रहना स्वीकार किया, लेकिन उस मंच पर जाना गवारा नहीं किया जहां प्रोटोकॉल की बलि चढ़ाई गई थी।
- प्रतीक चिन्ह का त्याग: स्मृति चिन्ह को अस्वीकार कर उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि सम्मान ‘वस्तु’ नहीं, ‘संस्कार’ है।
“यह लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस कुर्सी और जनादेश की है जिसे जनता ने अपना वोट देकर चुना है। अगर निर्वाचित प्रतिनिधि ही उपेक्षित है, तो आम जनता की क्या बिसात?”
वीडियो में कैद हुआ ‘सत्ता का सच’
हमारे पास मौजूद विशेष वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि किस तरह एक जन-प्रतिनिधि को उपेक्षित महसूस कराया गया और बाद में किस तरह प्रशासन अपनी गलती छुपाने के लिए मान-मनुहार की ‘औपचारिकता’ करता रहा। यह वीडियो सत्ता के गलियारों में बैठे योजनाकारों की कार्यशैली पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
बड़ा सवाल:
क्या खेल भावना के इस उत्सव में ‘लोकतांत्रिक मर्यादा’ का आउट होना शुभ संकेत है? क्या सत्ता के आयोजनों में सम्मान अब केवल खास चेहरों तक सीमित रह गया है?



