पर्यावरण में बदलाव! मानवता को खतरा।।
जनवरी में जिन चोटियों पर बर्फ होती थी, इस वर्ष दिख रही है आग। अभी भी नहीं संभले तो निकट भविष्य खतरे में है।

आज कल पहाड़ी की चोटियों में जगह जगह आग लगा लगने की घटनाएं सुनी और देखी जा रही है, यह वाकई एक विचलित कर देने वाली और कड़वी सच्चाई है। जिन पहाड़ों को हम ‘सफेद चादर’ (बर्फ) के लिए जानते थे, आज वहां से धुएं के बादल उठ रहे हैं। यह दृश्य न केवल डरावना है, बल्कि हमारे पर्यावरण के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। कुछ मुख्य कारण है जिनके कारण पूरा पर्यावरण खतरे में है:-
1. जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान:
दुनिया भर में बढ़ता तापमान पहाड़ों की बर्फ को तेजी से पिघला रहा है। जब बर्फ कम होती है, तो जमीन सूख जाती है। सूखी घास और चीड़ के पेड़ों की गिरी हुई पत्तियां ‘ईंधन’ का काम करती हैं, जिससे एक छोटी सी चिंगारी भी भीषण Forest Fire का रूप ले लेती है।
2. बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव:
अब सर्दियों में वैसी बर्फबारी नहीं होती जैसी पहले हुआ करती थी। शुष्क सर्दी के कारण जंगलों में नमी खत्म हो जाती है। नमी की कमी के कारण आग लगने की घटनाएं अब सिर्फ गर्मियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सर्दियों में भी देखने को मिल रही हैं।
3. चीड़ के जंगलों का बढ़ना:
हिमालय जैसे क्षेत्रों में चीड़ के पेड़ों की अधिकता है। इनकी पत्तियां बहुत ज्वलनशील होती हैं और जमीन पर एक मोटी परत बना लेती हैं, जो पानी को जमीन के अंदर जाने से रोकती हैं और आग को तेजी से फैलाती हैं। आने वाले भविष्य में इस स्थिति के गंभीर परिणाम सामने आयेंगे जो निम्न मुख्य परिणाम है:
- ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना: आग से निकलने वाली राख और कार्बन जब बची-कुची बर्फ पर जमती है, तो वह सूरज की गर्मी को ज्यादा सोखती है, जिससे बर्फ और तेजी से पिघलती है।
- जैव विविधता का नुकसान: दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ, जंगली जानवर और पक्षियों के घर राख हो रहे हैं।
- जल स्रोतों का सूखना: पहाड़ों में नमी खत्म होने से प्राकृतिक चश्मे और नदियां सूख रही हैं।
पहाड़ केवल घूमने की जगह नहीं हैं, वे हमारी नदियों के स्रोत और धरती के “थर्मामीटर” हैं। अगर थर्मामीटर ही जलने लगेगा, तो पूरी धरती का संतुलन बिगड़ना तय है।



