हाशिए से मुख्यधारा तक उक्रांद की धमक और मीडिया की मजबूरी

दिनेश पंत
उत्तराखंड की राजनीति में एक पुरानी कहावत रही है कि यहाँ दिल्ली से चलने वाले दो बड़े दल ही तय करते हैं कि पहाड़ की किस्मत क्या होगी। लेकिन हाल ही में मुख्यधारा के समाचार पत्रों के पन्नों पर जिस तरह से उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) को प्रमुखता मिलनी शुरू हुई है, वह राज्य की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत है। आखिर क्या वजह है कि जो मीडिया कल तक उक्रांद को ‘बीते हुए कल की पार्टी’ मानकर हाशिए पर रखता था, आज उसे ‘तीसरा विकल्प’ बताने पर मजबूर है?
विज्ञापन का गणित बनाम जनता का दबाव
यह किसी से छिपा नहीं है कि बड़े समाचार पत्र काफी हद तक सरकारी विज्ञापनों और सत्ता के रसूख पर टिके होते हैं। ऐसे में क्षेत्रीय दलों की खबरों को “कोने की जगह” मिलना भी बड़ी बात मानी जाती थी। लेकिन जब धरातल पर मूल निवास, भू-कानून और पलायन जैसे मुद्दे सुलगने लगे और उक्रांद ने इन मुद्दों को अपनी धार बनाई, तो मीडिया के लिए इसे अनदेखा करना असंभव हो गया। सच तो यह है कि अब मीडिया को विज्ञापन से ज्यादा ‘पाठकों के भरोसे’ की चिंता सताने लगी है, क्योंकि जनता अब अपनी आवाज़ अखबारों में खोजना चाहती है।
बौद्धिक क्रांति का आगाज
इस बार की हलचल सिर्फ नारों तक सीमित नहीं है। पूर्व आईएएस अधिकारियों, वैज्ञानिकों और कुलपतियों का दल से जुड़ना यह साबित करता है कि राज्य का प्रबुद्ध वर्ग अब भाजपा-कांग्रेस के ‘बारी-बारी’ वाले मॉडल से ऊब चुका है। उक्रांद अब केवल आंदोलनकारियों की भीड़ नहीं, बल्कि नीति-निर्धारकों का एक मंच बनता दिख रहा है। जब समाज का सबसे अनुभवी तबका सत्ता के खिलाफ क्षेत्रीय पहचान के साथ खड़ा होता है, तो अखबारों की सुर्खियाँ अपने आप बदल जाती हैं।
2027 की डगर और चुनौतियां
भले ही अखबारों में जगह मिलनी शुरू हो गई हो, लेकिन उक्रांद के लिए असली चुनौती ‘मिशन-70’ है। सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान साहस भरा है, लेकिन इसे वोट में बदलना एक बड़ी संगठनात्मक परीक्षा होगी। राष्ट्रीय दलों को डर इस बात का नहीं है कि उक्रांद जीत जाएगा, बल्कि डर इस बात का है कि उक्रांद उनके ‘वोट बैंक’ की जड़ें काट रहा है।
सीधी बात:-
देर से ही सही, समाचार पत्रों का निष्पक्ष और जवाबदेह होना लोकतंत्र के लिए सुखद है। लेकिन जनता को यह याद रखना होगा कि जो जगह आज उक्रांद ने अखबारों में बनाई है, वह किसी की कृपा नहीं बल्कि उत्तराखंडी स्वाभिमान की जीत है। अब देखना यह है कि क्या यह ‘तीसरा विकल्प’ 2027 में उत्तराखंड की तकदीर का ‘पहला विकल्प’ बन पाएगा?
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