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देवभूमि की परंपराओं की रक्षा या शराब का ज़हर? पहाड़ की मां-बहनों ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है।
उत्तराखंड की शांत वादियों में इन दिनों एक नई गूँज सुनाई दे रही है—शराब मुक्ति की गूँज। देवभूमि के सुदूरवर्ती गांवों से लेकर शहरों तक, महिलाएं हाथों में गंगाजल लेकर और मंदिरों की चौखट पर खड़े होकर सामूहिक कसमें खा रही हैं कि वे अपने गांव को नशामुक्त बनाएंगी। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि घर-परिवार को टूटने से बचाने की एक आखिरी छटपटाहट है।
1. कसमें और संकल्प: क्यों उठ रहे हैं हाथ?
हाल ही में गढ़वाल और कुमाऊं के कई ब्लॉकों में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जहाँ पूरी ग्राम सभा ने एक सुर में शराबबंदी का फैसला लिया है।
- महिलाओं का नेतृत्व: इस आंदोलन की रीढ़ महिलाएं हैं, जो घरेलू हिंसा और आर्थिक तंगी से तंग आ चुकी हैं।
- सामाजिक बहिष्कार: कई गांवों में यह नियम बनाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति शराब पीकर हंगामा करता है या गांव में शराब बेचता है, तो उस पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाएगा और उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।
2. शराब: पहाड़ की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा
पहाड़ों में शराब की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम बेहद डरावने हैं:
- आर्थिक बर्बादी: मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब की भेंट चढ़ रहा है, जिससे बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
- युवा पीढ़ी पर खतरा: रोजगार की तलाश में भटक रहे युवा नशे के जाल में फंस रहे हैं, जिससे ‘पहाड़ की जवानी’ खोखली हो रही है।
- बढ़ती दुर्घटनाएं: पहाड़ी मार्गों पर होने वाले सड़क हादसों का एक मुख्य कारण शराब पीकर गाड़ी चलाना (Drunken Driving) पाया गया है।
3. सरकारी राजस्व बनाम जनता का भविष्य
सरकार के लिए शराब राजस्व का एक बड़ा स्रोत है, लेकिन स्थानीय लोगों का तर्क अलग है:
- राजस्व का तर्क: सरकार का मानना है कि शराब से मिलने वाला टैक्स विकास कार्यों में खर्च होता है।
- सामाजिक तर्क: आंदोलनकारियों का कहना है कि जिस राजस्व की कीमत घरों की बर्बादी और युवाओं की मौत से चुकानी पड़े, वह विकास कैसा?
4. क्या केवल कसमें खाने से होगा समाधान?
इतिहास गवाह है कि पहाड़ में 1984 के ‘नशा नहीं, रोज़गार दो’ आंदोलन के बाद से कई बार शराबबंदी की मांग उठी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि:
- नियमों की सख्ती: केवल शपथ काफी नहीं, पुलिस और प्रशासन को अवैध शराब की तस्करी पर कड़ा प्रहार करना होगा।
जागरूकता: युवाओं को नशे के विकल्प के रूप में खेल, कौशल विकास और स्थानीय रोजगार से जोड़ना होगा।
पहाड़ की इन मां-बहनों द्वारा खाई जा रही कसमें एक चेतावनी हैं। यदि वक्त रहते सरकार और समाज ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत इस नशे के धुएं में ओझल हो जाएगी।
डिस्क्लेमर:
यह लेख उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे सामाजिक आंदोलनों और जन-भावनाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी पक्ष को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करना है।


