
रुद्रप्रयाग | 5 मार्च 2026
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना, जिसे उत्तराखंड के भाग्य की रेखा कहा जा रहा था, अब रुद्रप्रयाग के ग्रामीणों के लिए ‘खौफ की रेखा’ बनती जा रही है। निर्माण कंपनियों की मनमानी और नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे कार्यों के खिलाफ अब कानूनी बिगुल फूंक दिया गया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता विवेक कठैत ने जिला प्रशासन को सीधे तौर पर 72 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है।
रात का सन्नाटा और बारूद के धमाके
अधिवक्ता कठैत ने जिलाधिकारी को भेजे पत्र में गंभीर आरोप लगाए हैं कि सुरंग निर्माण में जुटी कंपनियां रात 11 बजे से तड़के 3 बजे तक भारी ब्लास्टिंग कर रही हैं।
- खौफ का साया: धमाकों की गूंज से सहमे ग्रामीण जब घरों से बाहर भागते हैं, तो बाहर बाघ और भालू जैसे हिंसक जानवरों का खतरा उनका इंतजार कर रहा होता है।
- नींद हराम: रात भर होने वाले इन धमाकों ने बुजुर्गों और बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बिगाड़ दिया है।
नदियों का कत्ल: अलकनंदा में समा रहा मलबा
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा अवैध मूक डंपिंग को लेकर है। निर्माण से निकलने वाले मलबे (Muck) को वैज्ञानिक तरीके से निस्तारित करने के बजाय, कंपनियां इसे सीधे अलकनंदा और स्थानीय गदेरों में उड़ेल रही हैं।
- यह सीधे तौर पर जल प्रदूषण निवारण अधिनियम (1974) का उल्लंघन है।
- डस्ट कंट्रोल (धूल रोकने) के लिए पानी का छिड़काव न होने से पूरा क्षेत्र धूल की चादर में लिपटा है, जिससे सांस की बीमारियों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है।
72 घंटे का अल्टीमेटम: अब बात NGT में होगी
विवेक कठैत ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन की चुप्पी “अपराधिक लापरवाही” के समान है। उन्होंने मांग की है कि:
- सूर्यास्त (शाम 6:00 बजे) के बाद किसी भी तरह की ब्लास्टिंग पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगे।
- नदियों में मलबा फेंकने वाली कंपनियों पर करोड़ों का भारी जुर्माना वसूला जाए।
- प्रभावित गांवों में धूल नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम हों।
चेतावनी: यदि 3 दिनों (72 घंटे) के भीतर इन मांगों पर जमीनी कार्रवाई नहीं दिखी, तो मामला सीधे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की चौखट पर पहुंचेगा।
बड़ी बात: “क्या पहाड़ का विकास यहां के लोगों की जान की कीमत पर होगा?” यह सवाल अब रुद्रप्रयाग की जनता पूछ रही है।
डिस्क्लेमर:
यह रिपोर्ट अधिवक्ता विवेक कठैत द्वारा जिला प्रशासन को सौंपे गए पत्र और स्थानीय निवासियों की शिकायतों पर आधारित है। ‘UK Cyber News’ किसी भी पक्ष की पुष्टि नहीं करता और प्रशासन व संबंधित कंपनियों का पक्ष आने पर उसे भी प्रमुखता से स्थान दिया जाएगा।


