जिस वर्दी पर होना था विद्यालय का नाम, वहां छपा है नेताजी का नाम
बच्चों की वर्दी से लेकर गांव की चौपाल तक: आखिर किस कोष से चल रहा है यह राजनीतिक प्रचार?

लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि जनता की सेवा करने के लिए चुना जाता है, स्वयं का प्रचार करने के लिए नहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति का स्वरूप जिस दिशा में बढ़ा है, वह कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आज स्थिति यह है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, गांव-गांव में बर्तन, कुर्सियां, ढोलक, चिमटे, पानी की टंकियां, खेल सामग्री, कंबल, स्कूल बैग, जैकेट और न जाने कितनी वस्तुएं नेताओं के नाम के साथ बांटी जाने लगती हैं।

हाल ही में सामने आई एक तस्वीर में प्राथमिक विद्यालय के बच्चों की जैकेट पर स्थानीय विधायक का नाम छपा दिखाई देता है। यदि यह तस्वीर वास्तविक है, तो यह केवल एक जैकेट नहीं, बल्कि हमारी राजनीति की बदलती मानसिकता का प्रतीक है।
प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को अच्छी शिक्षा, पुस्तकें, कॉपियां, प्रशिक्षित शिक्षक, कंप्यूटर शिक्षा और बेहतर विद्यालयी वातावरण देना है। वर्दी पर विद्यालय का नाम होना चाहिए ताकि वह विद्यालय की पहचान बने। लेकिन यदि वर्दी पर किसी जनप्रतिनिधि का नाम प्रमुखता से लिखा जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बच्चों को भी राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाया जा रहा है?
इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इन वस्तुओं के वितरण का पैसा आता कहां से है?
यदि यह सब किसी जनप्रतिनिधि की निजी आय से किया जा रहा है, तो इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए। जनता को जानने का अधिकार है कि एक जनप्रतिनिधि की घोषित आय कितनी है और उसी के अनुरूप यह खर्च किस प्रकार किया जा रहा है। यदि लाखों रुपये की सामग्री लगातार वितरित की जा रही है, तो उसके स्रोत पर सवाल उठना लोकतंत्र में बिल्कुल स्वाभाविक है। पारदर्शिता से किसी ईमानदार व्यक्ति को कभी डर नहीं होना चाहिए।
दूसरी ओर यदि यह सामग्री सरकारी योजनाओं या सरकारी धन से खरीदी गई है, तो फिर किसी व्यक्ति विशेष का नाम उस पर क्यों अंकित किया जा रहा है? सरकारी योजनाएं किसी विधायक, सांसद या मंत्री की निजी संपत्ति नहीं होतीं। उनका पैसा जनता के कर से आता है। इसलिए उसका श्रेय किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था और करदाताओं को जाना चाहिए।

दुर्भाग्य यह है कि भारतीय राजनीति में मुफ्त वितरण की संस्कृति अब एक चुनावी रणनीति बन चुकी है। कहीं बर्तन बांटे जाते हैं, कहीं कुर्सियां, कहीं खेल सामग्री, कहीं धार्मिक आयोजनों के लिए सामान, तो कहीं बच्चों को बैग और वर्दी। इन सब पर किसी न किसी नेता का नाम या फोटो अंकित कर दिया जाता है। धीरे-धीरे जनसेवा और आत्म-प्रचार की सीमा धुंधली होती जा रही है।
यह भी सच है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इन चीजों को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेता है। वर्षों से लोगों के मन में यह भावना बैठा दी गई है कि “मुफ्त मिल रहा है तो ले लो।” लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि सरकार के पास अपना कोई निजी खजाना नहीं होता। सरकारी पैसा अंततः जनता के कर से ही आता है।
सकारात्मक बात यह है कि अब एक नया युवा वर्ग तैयार हो रहा है। यह पीढ़ी केवल यह नहीं देखती कि किसने क्या बांटा, बल्कि यह भी पूछती है कि पैसा आया कहां से? प्रक्रिया क्या थी? क्या कोई निविदा हुई? क्या यह निजी दान था या सरकारी योजना? क्या इसका लेखा-जोखा सार्वजनिक है? यही प्रश्न लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।
यह लेख किसी एक नेता या दल पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है जिसमें जनहित के कार्यों को व्यक्तिगत प्रचार का माध्यम बना दिया जाता है। यदि आज एक दल ऐसा करता है तो कल दूसरा भी वही करता है। गलत परंपरा, गलत ही रहती है, चाहे उसे कोई भी अपनाए।
अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग, राज्य सरकारें और प्रशासन इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाएं। यदि कोई जनप्रतिनिधि निजी धन से समाजसेवा करता है तो उसका लेखा सार्वजनिक हो। यदि सरकारी धन से सामग्री वितरित होती है तो उस पर किसी व्यक्ति विशेष का नाम या फोटो न हो। जनता को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार सवाल पूछना है।
किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पहचान उसके नाम से छपी जैकेट नहीं, बल्कि उसके कार्य होने चाहिए। सड़कें बोलें, विद्यालय बोलें, अस्पताल बोलें, रोजगार बोले तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
अंत में केवल एक प्रश्न—
क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जहाँ बच्चों की वर्दी भी चुनावी पोस्टर बन जाए, या ऐसी राजनीति जहाँ बच्चे बेहतर शिक्षा, बेहतर सुविधाओं और बेहतर भविष्य के प्रतीक बनें?
यही प्रश्न आज का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न है।


