छात्र आंदोलन के बीच सियासत तेज़! आंगमो के बयान ने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी
राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन पर गीतांजलि आंगमो की दो टूक, कहा—छात्रों के बीच जाना चाहिए था, प्रतीकात्मक राजनीति से नहीं निकलेगा समाधान।

नई दिल्ली।
दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों सिर्फ़ एक धरना स्थल नहीं, बल्कि देश की राजनीति का नया रणक्षेत्र बन चुका है। एक तरफ़ प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भर्ती घोटालों और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर छात्र सड़कों पर हैं, तो दूसरी ओर सत्ता और विपक्ष इस आंदोलन के राजनीतिक मायने तलाशने में जुटे दिखाई दे रहे हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक ऐसा बयान सामने आया जिसने राजनीतिक बहस की दिशा ही बदल दी।
जिस समय विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, उसी समय जंतर-मंतर पर बैठे छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंता जता रहे थे। सवाल यह उठने लगा कि क्या छात्र आंदोलन अपनी मूल मांगों से भटककर राजनीतिक दलों की रणनीतियों का हिस्सा बनता जा रहा है?
इसी बीच लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो का बयान सामने आया, जिसने पूरे घटनाक्रम पर नई बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल को वास्तव में छात्रों के साथ खड़ा होना था तो उसे जंतर-मंतर पहुंचकर आंदोलन कर रहे युवाओं के बीच जाना चाहिए था, न कि अलग से प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रतीकात्मक प्रदर्शन करना चाहिए था।
आंगमो ने कहा कि जनता अब केवल तस्वीरों और प्रतीकात्मक राजनीति से प्रभावित होने वाली नहीं है। लोग यह देख रहे हैं कि कौन वास्तव में आंदोलन के साथ खड़ा है और कौन सिर्फ़ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों के आंदोलन को किसी भी दल के राजनीतिक हित के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
उनके बयान का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही था कि कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। यदि कोई दल युवाओं के भविष्य की चिंता जताता है, तो उसे सीधे छात्रों के बीच जाकर उनकी आवाज़ को मज़बूती देनी चाहिए। केवल कैमरों के सामने विरोध दर्ज कराने से आंदोलन की भावना मजबूत नहीं होती।
यही बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। कई लोगों ने इसे विपक्ष की रणनीति पर सवाल बताया, तो कई ने कहा कि यह संदेश सिर्फ़ किसी एक दल के लिए नहीं, बल्कि पूरी राजनीति के लिए है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने यह सवाल उठाया कि क्या छात्र आंदोलनों को राजनीतिक मंच बनने से बचाया जाना चाहिए।
उधर जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं है। उनका कहना है कि उनका संघर्ष केवल निष्पक्ष भर्ती, सुरक्षित परीक्षा प्रणाली और दोषियों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई के लिए है। कई छात्रों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वर्षों की मेहनत के बाद यदि पेपर लीक हो जाए तो सबसे बड़ा नुकसान उन युवाओं का होता है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की है।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दिल्ली पुलिस भी लगातार सक्रिय रही। जंतर-मंतर, संसद मार्ग और प्रधानमंत्री आवास के आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। बैरिकेडिंग, अतिरिक्त पुलिस बल और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। पुलिस का कहना है कि उसकी प्राथमिकता कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सभी पक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि सरकार छात्रों की आवाज़ को गंभीरता से लेने के बजाय आंदोलन को नियंत्रित करने में अधिक रुचि दिखा रही है। वहीं सरकार की ओर से लगातार यह कहा गया है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार और दोषियों के खिलाफ़ कार्रवाई के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं तथा किसी भी प्रकार की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस बीच सोनम वांगचुक ने अपना लंबा अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से बातचीत का आश्वासन मिलने और शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में सकारात्मक संकेत मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला किया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि युवाओं के मुद्दे अभी समाप्त नहीं हुए हैं और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रहेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जन आंदोलनों को राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखनी चाहिए या लोकतंत्र में राजनीतिक समर्थन भी आवश्यक है। लेकिन गीतांजलि आंगमो के बयान ने इस बहस में एक नया आयाम जोड़ दिया है। उनका संदेश साफ़ था कि आंदोलन का केंद्र छात्र होने चाहिए, न कि राजनीतिक तस्वीरें।
जंतर-मंतर की इस लड़ाई ने एक और सच्चाई सामने रखी है। लाखों छात्र आज भी उसी सवाल का जवाब चाहते हैं—क्या उनकी मेहनत सुरक्षित है? क्या परीक्षा प्रणाली पर दोबारा भरोसा किया जा सकता है? क्या दोषियों को वास्तव में सज़ा मिलेगी? लेकिन इन सवालों के बीच राजनीतिक बयानबाज़ी लगातार सुर्खियां बटोर रही है।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दल इस आंदोलन को अपने-अपने नज़रिए से आगे बढ़ाते हैं या वास्तव में छात्रों की मूल मांगों पर एकजुट होकर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं। फिलहाल इतना तय है कि जंतर-मंतर की गूंज अब सिर्फ़ छात्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने देश की राजनीति को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।



