विशेष रिपोर्ट: डिजिटल इंडिया या ‘डिजिटल धोखा’? सीएम हेल्पलाइन के पोर्टल पर विकास की बारिश, धरातल पर जनता को धूल और मलबे की मालिश!
CM हेल्पलाइन बनी 'कागजी समाधान' की फैक्ट्री? धरातल पर टूटी सड़कें और बिखरे पाइप, पोर्टल पर 'Completed' का खेल!

यूके साइबर न्यूज/ गोपेश्वर/ देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी तंत्र में एक नया चमत्कार हुआ है। अब सड़कें बनाने या पाइप बिछाने के लिए मजदूरों और कंक्रीट की जरूरत नहीं पड़ती, बस सीएम हेल्पलाइन के पोर्टल पर एक ‘पीडीएफ फाइल’ (PDF) चिपका दीजिए और काम ‘Completed’ हो जाता है।
गोपेश्वर की गलियों से आई ये तस्वीरें और विभाग के दस्तावेज चीख-चीखकर बता रहे हैं कि जनता के टैक्स के पैसे को कैसे ‘सिगूफा तंत्र’ की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

झूठ का पुलिंदा: जब 17 फरवरी का वादा ‘जुमला’ बन गया।
शिकायत संख्या CMHL-022026-1-951939 पर विभाग ने 17 फरवरी 2026 तक काम पूरा करने का लिखित शपथ-पत्र जैसा आश्वासन दिया था। आज 26 फरवरी हो गई है, लेकिन धरातल पर पाइप आज भी बेसहारा लावारिसों की तरह गली में पड़े हैं। सवाल यह है कि क्या विभाग के अधिकारियों के लिए ‘कैलेंडर’ की तारीखों का कोई मोल है या वे केवल मुख्यमंत्री कार्यालय को गुमराह करने में माहिर हो चुके हैं?
खुला खेल ‘अटैचमेंट’ का:

हकीकत बनाम पोर्टल
विभाग ने 12 फरवरी और 23 फरवरी को पोर्टल पर फाइलें तो अपडेट कीं, लेकिन उन फाइलों में शायद वो तस्वीरें नहीं थीं जो आज हम दिखा रहे हैं।
हकीकत 1: गली की टाइल्स उखड़कर ऐसे बिखरी हैं जैसे वहां कोई निर्माण नहीं, बल्कि विनाश हुआ हो।
हकीकत 2: पेयजल का पाइप बीच रास्ते में बाधा बनकर पड़ा है, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकता है।
हकीकत 3: पोर्टल पर स्टेटस ‘Partially Closed’ और ‘Completed’ दिखाकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने की कोशिश की गई है।
‘सिगूफा लाइन’ का नया कीर्तिमान:
वाह रे विभाग! जनता पानी की बूंद-बूंद और चलने लायक रास्ते को तरस रही है, और आपके साहब लोग पोर्टल पर ‘फाइल अटैच’ करके वाहवाही लूट रहे हैं। क्या शासन के पास ऐसा कोई चश्मा है जिससे उसे उखड़ी हुई सड़कें ‘चमकती हुई’ और खुले पाइप ‘जमीन के अंदर’ दबे हुए दिखाई देते हैं?
प्रशासन से तीखे सवाल:
क्या 1905 हेल्पलाइन केवल अधिकारियों की रेटिंग सुधारने का माध्यम बनकर रह गई है? 17 फरवरी की डेडलाइन खत्म होने के बाद भी झूठी रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारी पर अब तक ‘हंटर’ क्यों नहीं चला?
क्या मुख्यमंत्री कार्यालय ऐसी शिकायतों का ‘क्रॉस-वेरिफिकेशन’ केवल कागजों पर करता है या कभी धरातल पर भी झाँकने की जहमत उठाएगा?



