आग और धुएं में लिपटा देवभूमि का भविष्य,क्या हम राख के सौदागर बन रहे हैं?
शर्मिंदा करती मानवीय लापरवाही।

देहरादून।उत्तराखण्ड
उत्तराखंड के पहाड़ों से इस वक्त जो खबरें आ रही हैं, वे केवल जंगल जलने की नहीं, बल्कि एक सभ्यता के उजड़ने की हैं। कल तक जिसे हम ‘देवभूमि’ कहते नहीं थकते थे, आज वही पहाड़ धुएं के गुबार में गुम हैं। चमोली के गैरसैंण में एक महिला की मौत मात्र एक हादसा नहीं है, यह उस व्यवस्था और हमारी उस सामूहिक संवेदनहीनता की विफलता है, जिसने जंगलों को केवल ‘ईंधन’ और ‘कचरा’ मान लिया है।
हरित बोनस की आस और जलते हुए जंगल
एक तरफ हमारे नीति-निर्धारक दिल्ली के दरबारों में ‘हरित बोनस’ की गुहार लगाते हैं, तो दूसरी तरफ पहाड़ के ही निवासी अपनी ही जड़ों में आग लगा रहे हैं। यह कैसा विरोधाभास है? एक हाथ से हरियाली का मुआवजा मांगना और दूसरे हाथ से उसी हरियाली की चिता सजाना—क्या यही हमारा ‘विकास’ है? उन लोगों को शायद यह समझ नहीं आ रहा कि जिस ‘बीड़ी’ की चिंगारी से वे जंगल का सफाई अभियान शुरू करते हैं, वही चिंगारी कल उनके अपने घर की छत और फेफड़ों को राख कर देगी।

साक्ष्य और घटना: जब सांस लेना भी एक संघर्ष बन गया
हालिया स्थिति यह है कि देवल, गैरसैंण, रुद्रप्रयाग कर्णप्रयाग और यमुनोत्री, गंगोत्री मार्गो के जैसे इलाकों में हवा की गुणवत्ता ‘खतरनाक’ स्तर पर पहुँच गई है। जो पहाड़ी कभी शुद्ध हवा के लिए दुनिया भर में मशहूर थे, आज वे मरीज बनकर अस्पतालों की कतारों में खड़े हैं। दमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां अब गांव-गांव में पैर पसार रही हैं।
सोचिए, उन मासूम परिंदों का क्या हाल होगा, जिनके घोंसले इसी आग में जलकर स्वाहा हो गए? वे परिंदे जो कल तक पहाड़ों की सुबह को चहचहाहट से सजाते थे, आज उनकी चीखें इस धुएं में दबकर दम तोड़ रही हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि आने वाले पर्यटक, जो यहाँ की वादियों को ‘स्वर्ग’ मानकर आते हैं, क्या वे यह राख और काला पहाड़ देखने आएंगे? पर्यटन की कमर पहले ही टूट चुकी है, अब बची-खुची कसर ये वनाग्नि पूरी कर रही है।
ईश्वर की कृपा और इंसानी कुकृत्य
हम बड़े गर्व से कहते हैं कि श्री केदारनाथ और श्री बदरीनाथ धाम हमारे रक्षक हैं। लेकिन क्या हम उन देवताओं के आंगन में बैठकर उनके ही बनाए हुए जंगलों को जलाने का दुस्साहस नहीं कर रहे? हम मंदिर में घंटी बजाकर मन्नत मांगते हैं और बाहर आकर जंगल में आग लगा देते हैं। यह कैसी भक्ति है? शायद अब वक्त आ गया है कि हम भगवान से प्रार्थना करने के बजाय खुद को सुधारने की कसम खाएं।
आखिर हम कहाँ जा रहे हैं?
यह आग महज पेड़ नहीं जला रही, यह आने वाली पीढ़ी का भविष्य जला रही है। जिस तरह से हम अपनी प्राकृतिक संपदा को नष्ट कर रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड केवल कंक्रीट के जंगलों और सूखी बंजर जमीन का एक विशाल रेगिस्तान बनकर रह जाएगा।
UK Cyber News के माध्यम से हम आज हर उस पहाड़ी से पूछना चाहते हैं। क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में राख देंगे? अगर नहीं, तो आज ही अपनी माचिस, अपनी बीड़ी और अपनी संकुचित सोच को इस आग से दूर कर लें। वनाग्नि रोकना अब सरकारी काम नहीं, यह हम सबकी ‘अस्तित्व की लड़ाई’ है।
जांबाजों को नमन:
इस विनाशलीला के बीच, उन जांबाज वन कर्मियों और स्थानीय ग्रामीणों के साहसिक प्रयासों को भी सलाम करना चाहिए, जो इस नरक जैसी स्थिति में मोर्चे पर डटे हैं। आग बुझाना कोई साधारण कार्य नहीं है; यह मौत के मुंह में उतरने जैसा है। पहाड़ की खड़ी ढलानों और झुलसा देने वाली गर्मी के बीच, वन विभाग के कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ग्रामीण जिस तरह अपनी पारंपरिक सूझबूझ और अदम्य साहस के साथ आग के आगे ढाल बनकर खड़े हैं, वह प्रेरणादायक है। बिना किसी आधुनिक सुरक्षा कवच के, केवल गीली झाड़ियों और हौसले के दम पर ये ‘जंगल के रक्षक’ दिन-रात आग से जूझ रहे हैं। ये वे लोग हैं जो अपनी जान हथेली पर रखकर उन जंगलों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जो उनकी आजीविका और आस्था का आधार हैं। अगर आज उत्तराखंड के कई हिस्से राख होने से बचे हैं, तो इसका बड़ा श्रेय इन गुमनाम नायकों को जाता है, जो केवल फर्ज नहीं, बल्कि मिट्टी के प्रति अपना प्रेम निभा रहे हैं। उनके इस निस्वार्थ संघर्ष को नमन है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी लाजमी है। क्या हम इन योद्धाओं को पर्याप्त आधुनिक संसाधन और सुरक्षा दे पा रहे हैं, जिनके वे हकदार हैं?
याद रखिए, पहाड़ जलेंगे तो हम भी जलेंगे, और राख को ढोने के लिए कोई नहीं बचेगा।



