
मैंने बचपन में देखा था इन पहाड़ों को जवान होते,
नालों का पानी, बिना काम पूछे, मेरे पैरों तक आ जाता था।
अब वही पहाड़, थके-थके से लगते हैं, पगडंडियाँ बूढ़ी
और हवा में, थोड़ी-सी नाराज़गी।
मैं शहर में नौकरी ढूँढता हूँ, और पहाड़ पूछते हैं
“कितने में बेचोगे अपनी नींद? कितने में गिरवी रखोगे
सुबह की पहली धूप?” मैं चुप रहता हूँ, क्योंकि जवाब मेरे पास नहीं, सपनों की कीमत नौकरी की तनख्वाह से कभी कम नहीं होती।
कहते हैं!
समय सब बदल देता है, पर सच तो यह है, कि समय ने नहीं,
हमने ही पहाड़ों को, किराए पर चढ़ा दिया है, उन कंपनियों को,
जो जंगलों की उम्र नापती हैं मीटर से,
और पानी को तौलती हैं, लाभ में।
मैं सोचता हूँ काश जीवन भी, पहाड़ के पत्थर जैसा होता, जो दबता तो है, पर टूटता नहीं।
दिनेश पंत की कलम से।



