देहरादून के जंगलों में अवैध कब्जे पर UKD नेता लुसुन टोडरिया का कड़ा रुख
लुसुन टोडरिया ने पूछा- "मूल निवासी कहाँ जाए?"

देहरादून:
राजधानी देहरादून के चारों ओर सिमटते जंगल और उन पर बढ़ते अवैध कब्जों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के युवा नेता लुसुन टोडरिया ने इस मामले में न केवल प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि प्रदेश के उन लाखों मूल निवासी युवाओं की पीड़ा को भी आवाज़ दी है, जो अपने ही राज्य में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
युवाओं की अनदेखी और बाहरी लोगों का संरक्षण
लुसुन टोडरिया ने अपने बयानों में इस विरोधाभास को पुरजोर तरीके से उठाया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि:
- अधिकारों का हनन: एक तरफ तो उत्तराखंड का युवा रोजगार, शिक्षा और आवास की तलाश में अपने ही शहर में संघर्ष कर रहा है और भारी-भरकम किराया देकर कमरों में रहने को मजबूर है। वहीं दूसरी तरफ, बाहरी लोग सरकारी वन भूमि पर बेखौफ तरीके से पक्के मकान खड़ा कर रहे हैं।
- प्रशासन की चुप्पी पर सवाल: टोडरिया का आरोप है कि प्रशासन इन बाहरी लोगों को पानी, बिजली और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाकर उन्हें ‘अवैध से वैध’ बनाने में मदद कर रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा है कि
क्या ये सारी सरकारी सहूलियतें केवल बाहरी अतिक्रमणकारियों के लिए हैं? उत्तराखंड के मूल निवासी युवा के लिए यहाँ जगह क्यों नहीं है?
क्या सरकार ‘खास’ लोगों को बसाने का एजेंडा चला रही है?
लुसुन टोडरिया ने प्रशासन की मिलीभगत की ओर इशारा करते हुए कुछ बेहद तीखे सवाल किए हैं:
- जब एक स्थानीय युवा घर बनाने के लिए एक-एक कागज और एनओसी के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता है, तो फिर रातों-रात जंगल साफ कर आलीशान घर खड़ा करने वालों को बिजली कनेक्शन कौन दे रहा है?
- क्या यह ‘मिलीभगत’ केवल वोट बैंक की राजनीति है, या फिर उत्तराखंड की जनसांख्यिकी (Demography) बदलने की कोई बड़ी साजिश?
- बिजली विभाग के मीटर और खंभे, जो अतिक्रमण को ‘लीगल’ होने का सर्टिफिकेट दे रहे हैं, इसके पीछे किसका आदेश है?
- प्रशासन की यह ‘अंधी’ कार्यप्रणाली क्या युवाओं में बढ़ रहे आक्रोश को नजरअंदाज नहीं कर रही है?
- जब आम आदमी को घर बनाने के लिए कागजों की दौड़ लगानी पड़ती है, तो ये बाहरी लोग रातों-रात पक्के मकान कैसे खड़े कर रहे हैं?
लुसुन टोडरिया ने चेतावनी दी है कि यदि उत्तराखंड की वन भूमि और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा नहीं की गई, तो UKD सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई केवल जंगलों को बचाने की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के युवाओं के भविष्य को बचाने की है।



