उत्तराखंड पुलिस: 13 जुलाई को PHQ घेराव, 4600 ग्रेड-पे पर आर-पार
उत्तराखण्ड क्रांति दल और सामाजिक संगठनों का साथ, अधिवक्ता भी उतरे मैदान में

देहरादून।
उत्तराखंड पुलिस के 4600 ग्रेड-पे का मुद्दा एक बार फिर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और पुलिस परिवारों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा से शुरू हुआ यह मामला आज न्यायालय, शासन, पुलिस मुख्यालय और आंदोलन के मोड़ तक पहुंच चुका है। इसी के साथ 8 घंटे की ड्यूटी, पुलिसकर्मियों की कार्य परिस्थितियां और लंबे समय से लंबित मांगें भी एक बार फिर बहस के केंद्र में हैं।
पिछले कुछ वर्षों में इस मुद्दे पर अनेक ज्ञापन दिए गए, जनप्रतिनिधियों ने आवाज उठाई, विभिन्न संगठनों ने समर्थन किया और मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा। अब 13 जुलाई को प्रस्तावित पुलिस मुख्यालय (PHQ) घेराव को लेकर पूरे घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया है।
2021: जब हुई थी बड़ी घोषणा
21 अक्टूबर 2021 को पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को 4600 ग्रेड-पे दिए जाने की घोषणा की थी। इस घोषणा का पुलिस परिवारों ने स्वागत किया और इसे वर्षों पुरानी मांग के समाधान की दिशा में बड़ा कदम माना। हालांकि बाद में जब शासनादेश जारी हुआ तो उसमें स्थायी ग्रेड-पे लागू करने के बजाय पात्र पुलिसकर्मियों के लिए एकमुश्त आर्थिक लाभ का प्रावधान किया गया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। आंदोलन से जुड़े पुलिसकर्मियों और उनके समर्थकों का कहना है कि शासनादेश मुख्यमंत्री की मूल घोषणा की भावना के अनुरूप नहीं था।
समय बीता, लेकिन समाधान नहीं निकला
घोषणा के बाद पुलिसकर्मियों को उम्मीद थी कि जल्द ही सेवा नियमों में आवश्यक संशोधन कर 4600 ग्रेड-पे लागू कर दिया जाएगा। लेकिन समय बीतने के बावजूद ऐसा नहीं हुआ। इसी दौरान कई पुलिसकर्मियों, पूर्व कर्मचारियों और विभिन्न संगठनों ने सरकार तथा पुलिस मुख्यालय को ज्ञापन सौंपे। सोशल मीडिया के माध्यम से भी लगातार इस मुद्दे को उठाया जाता रहा। इसके बावजूद विवाद का स्थायी समाधान सामने नहीं आया।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला और कानूनी डेडलाइन का गणित
जब प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं निकला तो मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय पहुंचा। उच्च न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर निर्धारित समयावधि के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए।
न्यायालय के आदेशानुसार, 27 अक्टूबर 2025 से 6 महीने की समय-सीमा 27 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई थी। पुलिस विभाग को इस अवधि के भीतर इस पूरे प्रकरण की समीक्षा कर अपना निर्णय लेना था। यह समय-सीमा बीते हुए भी काफी वक्त हो चुका है, जिसके चलते पुलिस परिवारों में गहरा आक्रोश है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या मुख्यालय ने उस निर्धारित समय के भीतर कोई ठोस निर्णय लिया था, या मामला अभी भी पेंडिंग है?
दरअसल, इस पूरी प्रक्रिया का निष्कर्ष एक ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ के माध्यम से आना चाहिए था, जिसमें विभाग को यह स्पष्ट करना होता कि वह किस आधार पर इस मांग को स्वीकार या अस्वीकार कर रहा है। आज तक उस जवाब का न आना ही इस आंदोलन की मुख्य वजह बना है।
आखिर विवाद है किस बात पर?
4600 ग्रेड-पे विवाद केवल वेतन का मामला नहीं है। एक पक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई घोषणा को उसी रूप में लागू किया जाना चाहिए। दूसरी ओर सरकार का पक्ष न्यायालय में यह रहा है कि सेवा नियमों, पदोन्नति संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार इस विषय पर निर्णय लिया जाना आवश्यक है। इसी कारण यह मामला केवल प्रशासनिक न रहकर कानूनी व्याख्या का विषय भी बन गया।
ASI कैडर बनने के बाद और बढ़ी चर्चा
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू सहायक उपनिरीक्षक (ASI) कैडर से भी जुड़ा है। पुलिसकर्मियों का तर्क है कि मुख्यमंत्री की घोषणा उस समय की गई थी जब वर्तमान सेवा संरचना अस्तित्व में नहीं थी। इसलिए बाद में हुए प्रशासनिक बदलावों के आधार पर घोषणा की मूल भावना प्रभावित नहीं होनी चाहिए। वहीं प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि सेवा नियमों के अनुसार प्रत्येक निर्णय वर्तमान कैडर संरचना को ध्यान में रखकर लिया जाता है। यही मतभेद आज भी विवाद का प्रमुख कारण बना हुआ है।
8 घंटे की ड्यूटी का मुद्दा भी उतना ही बड़ा
4600 ग्रेड-पे के साथ-साथ पुलिसकर्मियों की दूसरी प्रमुख मांग 8 घंटे की ड्यूटी व्यवस्था है। पुलिसकर्मियों का कहना है कि व्यवहारिक रूप से उन्हें कई बार 12 से 16 घंटे अथवा उससे अधिक समय तक लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, चुनाव, वीआईपी ड्यूटी, कानून-व्यवस्था और आपदा जैसी परिस्थितियों में कार्य का दबाव और बढ़ जाता है। इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठाया गया। विपक्ष के कई नेताओं ने पुलिसकर्मियों की कार्य परिस्थितियों, आहार भत्ते तथा कार्य अवधि पर सरकार से सवाल किए। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक कार्यभार का प्रभाव पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन और कार्यकुशलता पर भी पड़ता है।
आंदोलन को मिलता समर्थन: लुसुन टोडरिया और एडवोकेट संदीप चमोली
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के मूल निवास-भू कानून प्रकोष्ठ के अध्यक्ष लुसुन टोडरिया ने आंदोलन को खुला समर्थन देते हुए कहा कि पुलिसकर्मियों की वर्षों पुरानी मांगों की लगातार अनदेखी दुर्भाग्यपूर्ण है। लुसुन टोडरिया ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंच से की गई घोषणा पर यदि वर्षों बाद भी स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया है, तो इससे पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी प्रदेश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं, इसलिए उनकी जायज़ मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
टोडरिया ने कहा, “यह संघर्ष अब आर-पार का है। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक मुख्यमंत्री का वह वादा हकीकत में न बदल जाए। 13 जुलाई को पुलिस परिवार, सामाजिक संगठन और राज्य के जागरूक नागरिक एक मंच पर होंगे। यह हुंकार उन रक्षकों की है जिन्हें सरकार ने केवल एक फाइल नंबर समझ लिया है। हमारा संकल्प स्पष्ट है—हक लेकर रहेंगे।”
वहीं, एडवोकेट संदीप चमोली ने भी इस आंदोलन को पूरी कानूनी और नैतिक मजबूती दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन पुलिसकर्मियों ने राज्य के लिए 20 वर्ष की कठिन सेवा दी है, उन्हें उनका वाजिब हक मिलना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस परिवारों की यह आवाज अब और अधिक मुखर होगी। 13 जुलाई को होने वाले प्रदर्शन में राज्य के तमाम सामाजिक, राजनीतिक संगठनों और पुलिस परिवार के लोगों को जुटने का आह्वान किया गया है ताकि सरकार पर इस नैतिक मांग को मानने के लिए दबाव बनाया जा सके।
15 दिन का अल्टीमेटम और 13 जुलाई का PHQ घेराव
हाल ही में सरकार को ज्ञापन सौंपकर 15 दिन के भीतर समाधान की मांग की गई थी। आंदोलनकारियों का आरोप है कि निर्धारित अवधि के भीतर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया। इसके बाद अब 13 जुलाई को देहरादून स्थित पुलिस मुख्यालय (PHQ) के घेराव का ऐलान किया गया है। आयोजकों का दावा है कि इस आंदोलन में पुलिस परिवारों के अलावा पूर्व सैनिक, सामाजिक कार्यकर्ता, राज्य आंदोलनकारी तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
UK Cyber News की मुहिम
पिछले कई महीनों से UK Cyber News इस पूरे मुद्दे को लगातार प्रमुखता से उठाता रहा है। मुख्यमंत्री की घोषणा से लेकर शासनादेश, न्यायालयी कार्यवाही, ज्ञापन, आंदोलन की तैयारियों और अब 13 जुलाई के प्रस्तावित PHQ घेराव तक, इस विषय से जुड़े हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम को क्रमबद्ध रूप से अपने पाठकों तक पहुंचाया गया है। इसी निरंतर कवरेज के कारण यह मुद्दा लगातार सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती पुलिसकर्मियों की अपेक्षाओं और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यदि सरकार वार्ता का रास्ता अपनाती है तो समाधान की संभावना बन सकती है। वहीं यदि मामला लंबा खिंचता है तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का स्थायी समाधान केवल संवाद, स्पष्ट प्रशासनिक निर्णय और कानूनी स्थिति स्पष्ट करने से ही संभव है।
पुलिस परिवार क्या चाहते हैं?
पुलिस परिवारों का कहना है कि उनकी मांग किसी नए लाभ की नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से की गई घोषणा के क्रियान्वयन से जुड़ी है। वे चाहते हैं कि सरकार इस विषय पर स्पष्ट निर्णय लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद का स्थायी समाधान करे।
जुमला या न्याय? चुनाव का गणित
गौरतलब है कि माननीय मुख्यमंत्री द्वारा हाल ही के किसी मीडिया इंटरव्यू में कहा गया है कि आगामी 2027 के चुनाव के बाद इस मामले में त्वरित कार्यवाही की जाएगी। इतने सालों से लंबित मामला, जबकि हाइकोर्ट द्वारा आदेश के बाद भी इस पर संज्ञान लेने में समय लग गया तो कहीं ये कोई चुनावी जुमला तो नही साबित होगा? क्योंकि कहीं न कहीं पुलिस और उनके परिवारों के वोटों की चिंता भी वर्तमान सरकार को होगी। अब देखना ये है कि धामी सरकार इसे चुनाव से पहले लाती है या उसके बाद।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें 13 जुलाई के प्रस्तावित आंदोलन पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार आंदोलन से पहले कोई पहल करती है या नहीं। यदि वार्ता होती है तो समाधान की दिशा में रास्ता निकल सकता है, अन्यथा यह मुद्दा आने वाले समय में और व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक चर्चा का विषय बन सकता है। उत्तराखंड पुलिस प्रदेश की कानून-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। ऐसे में पुलिसकर्मियों के मनोबल, कार्य परिस्थितियों और लंबित मांगों का समाधान केवल कर्मचारी हित का प्रश्न नहीं बल्कि प्रभावी प्रशासन और बेहतर पुलिसिंग से भी जुड़ा हुआ विषय है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज़ों, न्यायालयी कार्यवाही, सरकारी अभिलेखों, संबंधित पक्षों के सार्वजनिक बयानों और अब तक सामने आए घटनाक्रम के आधार पर तैयार की गई है। यदि सरकार या संबंधित विभाग की ओर से कोई नया आधिकारिक निर्णय जारी होता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
✍️ विशेष रिपोर्ट: प्रेम पडियार | वरिष्ठ संवाददाता | UK Cyber News



