
घनसाली/ यूके साइबर न्यूज:
उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था ने एक बार फिर वह कर दिखाया
जिसमें वह सबसे आगे है,
एक और मौत को ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कहकर
फाइलों में दर्ज करने का काम।
घनसाली की 24 वर्षीय प्रसूता नीतू,
बेलेश्वर अस्पताल से श्रीनगर रेफर हुईं,
मगर अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ गईं।
जैसे सिस्टम ने पहले ही तय कर लिया हो
कि पहाड़ की महिलाओं को इलाज नहीं,
बस सांत्वना ही मिलेगी–वो भी देर से।
इधर मंत्री धनसिंह रावत जी का बयान
अभी भी सामाजिक मीडिया पर घूम रहा है,
“हमारे डॉक्टर मरीजों को ढूंढ रहे हैं।”
तंज यह है कि…
नीतू को खोजने की ज़रूरत ही नहीं थी,
वह एंबुलेंस में थी,
बस सिस्टम सो रहा था।
सरकारी मशीनरी की प्रतिक्रिया भी हमेशा की तरह ‘तेज़’ है,
तेज़ इस मायने में है –
कि बयान तुरंत तैयार हो जाता है:
जांच होगी,
जिम्मेदारी तय होगी,
सुधार किए जाएँगे।
बस ज़मीनी बदलाव की प्रक्रिया वही
पुरानी सरकारी एंबुलेंस की रफ्तार से चलती है।
सड़कें टूटी हैं,
अस्पताल आधे-अधूरे,
एंबुलेंस कभी समय पर नहीं,
और जवाबदेही हमेशा अगले नोटिस तक ‘स्थगित।’
यह मौत किसी एक परिवार पर आई त्रासदी नहीं,
यह वह आईना है
जिसमें पहाड़ रोज़ अपनी बदहाल चिकित्सा व्यवस्था का थका हुआ चेहरा देखता है।
तंज यह भी है,
रिपोर्टों में सुविधाएँ “उपलब्ध” लिख दी जाती हैं,
लेकिन मरीजों को वही सुविधाएँ
अक्सर गूगल मैप पर भी नहीं मिलतीं।
नीतू की मौत पूछ रही है
क्या पहाड़ों की माताएँ हमेशा
सड़क और सिस्टम के बीच ही दम तोड़ेंगी?
या कभी वह दिन भी आएगा
जब जिम्मेदारी सिर्फ बयान न होकर
किसी कुर्सी पर असर भी डालेगी?”
“दिनेश पंत की कलम से”


