42 शहादतों और लंबे संघर्षों से बने उत्तराखण्ड का सपना सम्मानजनक, पारदर्शी और जनहितकारी शासन का था। आंदोलनकारियों ने ऐसे राज्य की कल्पना की थी जहाँ जनता की आवाज़ सुनी जाए, युवाओं को रोजगार मिले, पलायन रुके और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। लेकिन आज स्थिति यह है कि उच्च शिक्षा के लिए भी बच्चों को पहाड़ से मैदान की तरफ भागना पड़ता है और 26 साल राज्य बने हो जाने के बाद भी स्थायी राजधानी का प्रश्न अनसुलझा है।
इसके बावजूद राज्य में बेरोज़गारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, सड़क, मूल निवास और भू-कानून जैसे अनेक मुद्दे जनता के सामने चुनौती बने हुए हैं। दूसरी ओर, जनप्रतिनिधियों को अनेक सरकारी सुविधाएँ प्राप्त हैं, जिससे जनता के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि राज्य निर्माण के मूल उद्देश्य कितने पूरे हुए।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि विधानसभा जैसे लोकतंत्र के पवित्र मंदिर में भी अमर्यादित और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग देखने को मिला, जिसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं और जनता की भावनाओं को ठेस पहुँचाई। जनता अपने प्रतिनिधियों से शालीन भाषा, गरिमापूर्ण आचरण और जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा करती है। विधानसभा वह मंच है जहाँ विचारों का संघर्ष होना चाहिए, शब्दों की मर्यादा का नहीं।
आज आवश्यकता है कि उत्तराखण्ड की राजनीति राज्य आंदोलन की मूल भावना—जनहित, पारदर्शिता, जवाबदेही और सम्मानजनक लोकतांत्रिक आचरण—की ओर लौटे। 42 शहीदों के बलिदान का सच्चा सम्मान तभी होगा जब सत्ता का केंद्र जनता का विश्वास, विकास और सम्मान बने, न कि विवाद और कटु भाषा।
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