सरकार के एकतरफा फैसले पर नाराज़गी
यूनियनों ने नए लेबर कोड को बताया—“मजदूरों के साथ धोखाधड़ीपूर्ण छल”

नई दिल्ली/ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 21 नवंबर को चार नई श्रम संहिताएँ लागू करने के बाद देशभर में श्रमिक संगठनों का विरोध तेज हो गया है। 29 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर बनाए गए इन कोड्स को “मजदूर-विरोधी” और “कॉर्पोरेट परस्त” बताते हुए देश की दस प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 26 नवंबर को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।
जॉइंट प्लेटफ़ॉर्म ऑफ़ सेंट्रल ट्रेड यूनियंस जिसमें एआईटीयूसी, आईएनटीयूसी, सीआईटीयू सहित प्रमुख संगठन शामिल हैं, ने इसे सरकार का “एकतरफा और अलोकतांत्रिक कदम” बताया है। यूनियनों का आरोप है कि श्रम सुधारों के नाम पर सरकार ने वे प्रावधान कमजोर किए हैं जो मजदूरों को नौकरी की सुरक्षा, उचित वेतन और यूनियन अधिकार देते थे।
यूनियनों के अनुसार, सरकार द्वारा लागू किए गए कोड्स से :-
नौकरी की असुरक्षा बढ़ेगी, क्योंकि फिक्स्ड-टर्म रोजगार और ठेका प्रथाओं को बढ़ावा मिल सकता है।
सामाजिक सुरक्षा का कवरेज सीमित रहेगा, खासकर गिग व प्लैटफॉर्म वर्कर्स के लिए।
न्यूनतम वेतन में सुधार का दावा ज़मीनी स्तर पर कमजोर है।
कई पुराने कानूनों में मौजूद कड़े सुरक्षा एवं दंड प्रावधान कमज़ोर किए गए हैं।
वहीं सरकार का दावा है कि नए कोड्स से नियमों में सरलता आएगी, आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, और करोड़ों मजदूरों को औपचारिक सुरक्षा, जैसे सामाजिक सुरक्षा, समय पर वेतन और कार्यस्थल पर सुरक्षा का लाभ मिलेगा।
लेकिन ट्रेड यूनियनें इस दावे को भ्रामक मानती हैं और कहती हैं कि सरकार ने न तो उनसे उचित संवाद किया और न ही इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस जैसे मंचों को सक्रिय किया।
इसी असंतोष के चलते यूनियनों ने देशभर में मोर्चे, गेट मीटिंग्स और ब्लैक-बैज विरोध शुरू कर दिया है, जिसकी अंतिम कड़ी 26 नवंबर का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन होगा।
अब देखने वाली बात होगी कि सरकार और श्रमिक संगठनों के बीच यह टकराव किस दिशा में जाता है क्योंकि इसका सीधा असर करोड़ों श्रमिक परिवारों और देश की औद्योगिक व्यवस्था पर पड़ने वाला है।



