सिरोहबगड़: सियासत का वो पोषित जिन्न जो आधी सदी से ढो रहा है विकास का ढोंग!
अरबों स्वाहा हो गए; मगर सिस्टम की फाइलों में आज भी 'अमर' है सिरोहबगड़ का जिन्न!
UK Cyber News – विशेष पड़ताल
श्रीनगर/रुद्रप्रयाग:
ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-58) पर सफर करने वाला हर व्यक्ति ‘सिरोहबगड़’ नाम से वाकिफ है। यह सिर्फ एक भूस्खलन क्षेत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड के माथे पर एक ऐसा नासूर है जो पिछले आधी सदी से रिस रहा है। तीन पीढ़ियां गुजर गईं, दर्जनों सरकारें आईं और गईं, बजट के अरबों रुपये मलबे के साथ स्वाहा हो गए, लेकिन सिरोहबगड़ का ‘जिन्न’ आज भी जस का तस खड़ा है।

एक व्यक्तिगत दास्तान: तीन पीढ़ियों का दर्द
लेखक और पत्रकार के तौर पर जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह दर्द और गहरा हो जाता है। मुझे याद है जब मैं पहली बार 8 साल की उम्र में अपने पिताजी के साथ गांव आया था, तब भी सिरोहबगड़ का वही खौफ था। पिताजी ने बताया था कि उन्होंने भी बचपन से इसे ऐसा ही देखा है। आज मैं खुद 50 की उम्र के करीब हूँ और मेरे बच्चे 18 साल के हो चुके हैं, लेकिन सिरोहबगड़ आज भी वैसा ही डरावना है।
सोचिए, जिस सिस्टम को एक स्थायी समाधान ढूंढने के लिए आधी सदी (50 साल) कम लग रही हो, क्या उसे हम ‘सक्षम’ कह सकते हैं? क्या हमारी आगे आने वाली चौथी पीढ़ी भी इसी खौफनाक मलबे के बीच अपनी जान हथेली पर रखकर सफर करेगी?
बजट का ब्लैक होल और टेक्नोलॉजी का तमाशा
सिरोहबगड़ सिर्फ मलबा नहीं उगलता, बल्कि यह सरकारी खजाने को निगलने वाला एक ‘ब्लैक होल’ बन चुका है। उत्तर प्रदेश के जमाने से लेकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तक, न जाने कितने करोड़ रुपये इस चंद मीटर के पैच को ‘ठीक’ करने के नाम पर बहा दिए गए।
यहाँ के इतिहास में ‘स्विस टेक्नोलॉजी’ (Swiss Technology) का नाम बड़े शोर-शराबे से लिया गया। पहाड़ पर लोहे की जालियां बिछाई गईं, कंक्रीट की ऊंची दीवारें खड़ी की गईं, लेकिन सिरोहबगड़ ने हर आधुनिक तकनीक को ठेंगा दिखा दिया। यहाँ सवाल यह खड़ा होता है कि क्या यह तकनीक वाकई फेल हुई या इसे जानबूझकर फेल होने दिया गया? क्या सिरोहबगड़ को ‘ठीक न करना’ कुछ लोगों के लिए सालाना कमाई का जरिया (Annual Maintenance Scam) बना हुआ है?
ऑल वेदर रोड और कछुआ गति का खेल
जब प्रधानमन्त्री की महत्वाकांक्षी ‘ऑल वेदर रोड’ परियोजना शुरू हुई, तो पहाड़ की जनता में एक उम्मीद जगी थी। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि सिरोहबगड़ के नीचे से एक ‘बायपास पुल’ (Bypass Bridge) बनाकर इस झंझट को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाएगा।
काम शुरू हुआ, भारी भरकम मशीनें आईं, लेकिन पिछले कुछ सालों से उस पुल पर काम ‘कछुए की गति’ से चल रहा है। आज स्थिति यह है कि न वहां मजदूर दिखते हैं, न मशीनें। पुल का ढांचा धूल फांक रहा है। आखिर इस देरी का जिम्मेदार कौन है? क्या इस देरी के पीछे भी वही मंशा है कि सिरोहबगड़ का ‘जिन्न’ जिंदा रहे ताकि आपदा मद का पैसा आता रहे?
सिरोहबगड़: आंकड़ों के आइने में एक सफेद हाथी
- उम्र का आंकड़ा: सरकारी दस्तावेजों और स्थानीय इतिहास के अनुसार, यह जोन पिछले 50 से 55 वर्षों (1970 के दशक से) से सक्रिय है।
- बाईपास का बजट: ‘ऑल वेदर रोड’ परियोजना के तहत पपडासू-भुमरागढ़-नौगांव बाईपास (लगभग 2.750 किमी) और तीन पुलों का प्रस्ताव वर्ष 2017-18 में पास हुआ था। इसकी अनुमानित लागत करोड़ों में है, लेकिन 6 साल बाद भी यह ‘अधर’ में है।
- पुलों की स्थिति: इस बाईपास को हाईवे से जोड़ने के लिए 3 पुल प्रस्तावित थे:
- पपडासू पुल (180 मीटर): इसका ढांचा लगभग 90% तैयार है, लेकिन आगे का काम बंद है।
- भुमरागढ़ पुल (250 मीटर): यहाँ अभी तक पिलर की खुदाई भी पूरी नहीं हो पाई है।
- नौगांव पुल (162 मीटर): चित्रमति नदी पर बनने वाले इस पुल के पिलर भी सालों से अधूरे पड़े हैं।
- समय की बर्बादी: पिछले 6 सालों में बाईपास रोड का कटान तक पूरा नहीं हो सका है, जिसके कारण यात्रियों को आज भी उसी खतरनाक ‘सिरोहबगड़’ के पुराने पैच से गुजरना पड़ता है।
- रखरखाव का खर्च: आधिकारिक तौर पर कुल आंकड़ा सार्वजनिक नहीं है, लेकिन अनुमान है कि हर साल मानसून के दौरान यहाँ से मलबा हटाने और पैचवर्क करने में लाखों-करोड़ों रुपये स्वाहा हो जाते हैं।
आंकड़े गवाह हैं कि 2017-18 में स्वीकृत हुआ पपडासू-भुमरागढ़-नौगांव बाईपास आज 6 साल बाद भी कछुआ गति का शिकार है। पपडासू में 180 मीटर का पुल तो खड़ा कर दिया गया, लेकिन भुमरागढ़ और नौगांव के पुलों के पिलर आज भी सिस्टम की सुस्ती की कहानी कह रहे हैं। 2.7 किलोमीटर का बाईपास बनाने में अगर आधी दशक लग जाए, तो इसे विकास कहें या विनाश?
सीधी बात: अब तो रिटायर कर दो प्रभु!
सिरोहबगड़ के ‘अभिभावकों’ (नेताओं और अधिकारियों) से विनम्र अपील है— “हे गुरुजनों, अब वह बुढ़ा हो चुका है, उसे रिटायर कर दो प्रभु!” उसके चक्कर में जो नई सड़क और नया पुल बन रहा है, उसे पूरा करो। शायद भारी वाहनों की आवाजाही बंद होने से सिरोहबगड़ अपने आप शांत हो जाए।
जब भी कोई यात्री सिरोहबगड़ के मलबे के बीच से गुजरता है, तो वह गालियां पहाड़ को नहीं, बल्कि उस सिस्टम और उन सफेदपोशों को देता है जिन्होंने इस नासूर को आधी सदी तक पाल-पोसकर बड़ा किया है।
डिस्क्लेमर:-
“यह रिपोर्ट जनहित (Public Interest) में सिरोहबगड़ की दशकों पुरानी समस्या और यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत अनुभव और क्षेत्र की जमीनी हकीकत पर आधारित हैं। लेख का उद्देश्य किसी विभाग, अधिकारी या व्यक्ति विशेष की छवि को धूमिल करना नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु ध्यानाकर्षण करना है। प्रकाशित तथ्यों और आंकड़ों का आधार स्थानीय जनश्रुतियां और वर्षों से लंबित कार्य की वर्तमान स्थिति है।
सावधान रहें, सुरक्षित रहें!
रिपोर्ट: ब्यूरो, UK Cyber News



