शिक्षा विभाग की बेशर्मी: लूट रहे स्कूल और साहब को लिखित शिकायत का इंतज़ार, हमाम में सब नंगे!
आबकारी और पुलिस जैसी 'रेड' शिक्षा विभाग के लिए सपना क्यों? क्या मलाई में हिस्सेदारी है?

अभिभावक कोई उपभोक्ता नहीं, जो दुकान बदल ले, शिक्षा के बाजारीकरण में वह सिर्फ एक ‘बेबस मछली’ है!
देहरादून (UK Cyber News)। शहर के प्रमुख समाचार पत्रों में छपी ये खबरें साफ़ तौर पर निजी स्कूलों की मनमानी और अवैध वसूली के सिंडिकेट को उजागर कर रही हैं। लेकिन उत्तराखंड का शिक्षा विभाग धृतराष्ट्र की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर बैठा है। विभाग का यह तर्क कि “कोई अभिभावक लिखित शिकायत नहीं करता”, दरअसल अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का एक घटिया बहाना है।


अभिभावक शिकायत क्यों नहीं करता? विभाग ये कड़वा सच जान ले!
मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) विनोद कुमार डोडियाल और उनके महकमे को शायद यह आभास नहीं है कि एक अभिभावक किन परिस्थितियों में जीता है। अभिभावक शिकायत इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि:
- बच्चे के भविष्य का सवाल: शिकायत करने पर स्कूल प्रशासन बच्चे को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर सकता है या उसे स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा सकता है। कोई भी पिता अपने बच्चे के भविष्य से खिलवाड़ नहीं करना चाहता।
- राशन की दुकान नहीं है स्कूल: अभिभावक कोई सामान्य उपभोक्ता (Consumer) नहीं है। अगर वह राशन की दुकान वाले की शिकायत करेगा, तो वह दूसरी दुकान से सामान ले सकता है। लेकिन शिक्षा के इस धंधे में, अगर एक स्कूल से दुश्मनी मोल ली, तो डर है कि शहर का कोई दूसरा स्कूल भी उसके बच्चे को दाखिला नहीं देगा।
- दुश्मनी का डर: पिछले स्कूल से नाता टूटने के बाद वह स्कूल तो दुश्मन बन ही जाता है, साथ ही विभाग की सुस्ती के चलते अभिभावक खुद को अकेला और असुरक्षित महसूस करता है।

क्या अखबार की खबरें आधार नहीं हैं?
UK Cyber News सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय और अधिकारियों से पूछता है कि क्या मीडिया में आए दिन छप रही ये खबरें और सोशल मीडिया पर अभिभावकों का आक्रोश कार्रवाई के लिए काफी नहीं है?
- पुलिस और आबकारी जैसी रेड क्यों नहीं? जिस तरह पुलिस अपराध रोकने के लिए और आबकारी विभाग अवैध शराब पकड़ने के लिए औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) करता है, वैसी प्रक्रिया शिक्षा विभाग क्यों नहीं दोहराता?
- क्या मलाई के हकदार आप भी हैं? क्या विभाग को कार्रवाई करने के लिए किसी ‘बलि के बकरे’ (शिकायतकर्ता) का ही इंतजार है? या फिर इस वसूली के खेल में ‘ऊपर’ तक हिस्सा जा रहा है?
विभाग बंद करो, सरकार का राजस्व तो बचेगा!
अगर करोड़ों के बजट वाले इस विभाग को हर काम के लिए अभिभावक की ही अर्जी चाहिए, तो फिर इस विभाग का अस्तित्व ही क्यों है? बेहतर होगा कि इसे बंद कर दिया जाए ताकि कम से कम सरकार का कुछ राजस्व तो बचे। अखबार की ये कतरनें गवाह हैं कि लूट मची है, अब देखना यह है कि विभाग कब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित तथ्यों, सोशल मीडिया पर अभिभावकों के आक्रोश और जनहित को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। UK Cyber News का उद्देश्य किसी संस्थान की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों और अभिभावकों की बेबसी को शासन-प्रशासन तक पहुँचाना है। व्यवस्था में सुधार की मांग करना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य है।



