खाकी का हक कब तक मारेगी सरकार? 8 घंटे की ड्यूटी सिर्फ कागज पर, ग्रेड-पे का इंतज़ार अब भी बरकरार!
ड्यूटी 24 घंटे की, भत्ता ₹30 का और ग्रेड-पे का अता-पता नहीं... क्या देवभूमि की सुरक्षा करने वाले इन वीर सपूतों के परिवारों का दर्द सरकार को दिखाई नहीं देता?

देहरादून/गैरसैंण:
उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में उस ‘मौन’ अनुशासित बल की आवाज गूंजी, जो खुद अपने हक के लिए सड़क पर नहीं उतर सकता। कांग्रेस विधायक भुवन कापड़ी ने सदन में सरकार को घेरते हुए एक ऐसा सवाल उछाला, जिसने सत्ता पक्ष को निरुत्तर कर दिया। सवाल सीधा था – “जब जेल में बंद एक कैदी के भोजन का सरकारी खर्च 50 रुपये है, तो दिन-रात सुरक्षा में तैनात पुलिस जवान का आहार भत्ता महज 30 रुपये क्यों?”
1. भोजन भत्ते का अपमानजनक गणित
विधायक कापड़ी ने सदन में आंकड़ों के जरिए बताया कि एक तरफ सरकार कैदियों के मानवाधिकारों और उनके पोषण की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ 24 घंटे मुस्तैद रहने वाले सिपाहियों को ‘मूंगफली’ के बराबर भत्ता दिया जा रहा है। 30 रुपये में आज के दौर में एक वक्त की ढंग की थाली भी नहीं आती, ऐसे में जवान के स्वास्थ्य और मनोबल पर क्या असर पड़ता होगा, यह सोचने वाली बात है।
2. ग्रेड-पे की फाइल और वादों की ‘धूल’
उत्तराखंड पुलिस लंबे समय से 4600 ग्रेड-पे की मांग को लेकर संघर्षरत है। पूर्व में बनी ग्रेड-पे समिति की रिपोर्ट अब भी ठंडे बस्ते में है। कापड़ी ने आरोप लगाया कि सरकार केवल आश्वासन की राजनीति कर रही है, जबकि धरातल पर सिपाही आज भी आर्थिक विसंगतियों से जूझ रहा है।
3. कोर्ट का आदेश और सिस्टम की अनदेखी: 8 घंटे की ड्यूटी का क्या हुआ?
रिपोर्ट की सबसे बड़ी विसंगति ड्यूटी के घंटों को लेकर है।
कानूनी पहलू: माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पुलिस कर्मियों की ड्यूटी का समय निर्धारित (8 घंटे) किया जाए ताकि उन्हें मानसिक तनाव से मुक्ति मिले।
लेकिन हकीकत यह है कि आज भी उत्तराखंड का जवान 12 से 16 घंटे की ड्यूटी कर रहा है। वीआईपी मूवमेंट हो, त्योहार हों या आपदा—पुलिस का सिपाही ‘ऑफ’ नहीं होता। सवाल यह है कि जब न्यायालय का आदेश है, तो सरकार ने अतिरिक्त मैनपावर की भर्ती कर शिफ्ट सिस्टम लागू क्यों नहीं किया?
4. पहाड़ की चुनौती और सौतेला व्यवहार
पहाड़ की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में, जहां पारा शून्य से नीचे चला जाता है, वहां तैनात जवान को न तो पर्याप्त आवासीय सुविधाएं मिल रही हैं और न ही कठिन सेवा भत्ता। कापड़ी ने इसे जवानों के साथ ‘सौतेला व्यवहार’ करार दिया है।
निष्कर्ष: जनता की राय
क्या सरकार केवल तालियां बजवाने के लिए ‘मित्र पुलिस’ का नारा देती है, या वास्तव में उनके पेट और परिवार की चिंता भी करती है? ग्रेड-पे समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक न करना सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
बड़ी मांग:
- ग्रेड-पे विसंगति तत्काल दूर हो।
- भोजन भत्ते को कैदियों के भत्ते से ऊपर (सम्मानजनक) किया जाए।
- कोर्ट के आदेशानुसार 8 घंटे की शिफ्ट ड्यूटी अनिवार्य रूप से लागू हो।



