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दुनिया की राजनीति आज एक ऐसे सर्कस की तरह हो गई है जहाँ शेर भूखा है, रिंग मास्टर (अमेरिका) पागल है और तमाशा हम देख रहे हैं। मिडिल ईस्ट में गिरती मिसाइलें और मलबे में दबे मासूम बच्चे चीख-चीख कर एक ही सवाल पूछ रहे हैं— क्या इंसानियत का कोई धर्म या भूगोल होता है?
1. पश्चिमी देशों का सुविधाजनक दर्द
जब यूक्रेन पर हमला हुआ, तो पूरा पश्चिम (West) रोने लगा, मानवाधिकारों की दुहाई दी गई और रूस पर पाबंदियों की झड़ी लगा दी गई। लेकिन वही अमेरिका और उसके साथी देश आज मिडिल ईस्ट में हो रहे कत्लेआम पर ‘मौन व्रत’ धारण किए हुए हैं। क्यों? क्या गाजा या लेबनान के बच्चों का खून ‘सस्ता’ है? यह दोहरा मापदंड ही आज की सबसे बड़ी बीमारी है।
2. तेल का खेल और हथियारों की सेल
हकीकत तो यह है कि अमेरिका को न लोकतंत्र से मतलब है, न मासूमों की जान से। उसे मतलब है ‘पेट्रोलियम’ की पाइपलाइनों से और अपनी ‘हथियार कंपनियों’ के टर्नओवर से। मिडिल ईस्ट जलता रहेगा, तो उनके बम बिकेंगे। शांति हो गई, तो उनका अरबों डॉलर का धंधा चौपट हो जाएगा। यह ‘ग्लोबल दादागिरी’ शांति के लिए नहीं, बल्कि अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए है।
3. भारत का बैलेंसिंग एक्ट न झुके, न रुके
इस पूरे महासंग्राम में भारत का रुख देखने लायक है। जहाँ दुनिया दो गुटों में बँटी है, वहीं भारत ने साफ कह दिया है ‘यह युद्ध का युग नहीं है।’
क्रेडेबल डिप्लोमेसी: भारत ने इजरायल से दोस्ती भी निभाई और फिलिस्तीन को मानवीय मदद भी भेजी।
- दबाव में न आना: अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर आँखें दिखाईं, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हित (National Interest) को ऊपर रखा। यह नया भारत है, जो अपनी विदेश नीति वाशिंगटन के इशारों पर नहीं, बल्कि दिल्ली के हितों पर तय करता है।
4. चौधराहट की एक्सपायरी डेट
अमेरिका को समझना होगा कि अब वो दौर गया जब एक देश पूरी दुनिया का फैसला बंद कमरों में करता था। आज भारत जैसे देश वैश्विक व्यवस्था में अपनी जगह बना चुके हैं। दादागिरी और एकतरफा फैसलों ने दुनिया को सिर्फ विनाश दिया है। मिडिल ईस्ट की ये आग अगर नहीं रुकी, तो इसकी लपटें सात समंदर पार अमेरिका के आंगन तक भी पहुँचेंगी।
नज़रिया:
आज जरूरत ‘सुपरपावर’ बनने की नहीं, बल्कि ‘रिस्पॉन्सिबल पावर’ बनने की है। बमों की गूंज में बातचीत की आवाज दबनी नहीं चाहिए। अगर अमेरिका वाकई दुनिया का रहनुमा बनना चाहता है, तो उसे ‘हथियार बेचना’ बंद कर ‘शांति बनाना’ सीखना होगा। वरना इतिहास उसे एक ‘रक्षक’ नहीं, बल्कि ‘भक्षक’ के तौर पर याद रखेगा।
Note: This editorial reflects an analytical perspective based on global data. UK Cyber News maintains neutrality in geopolitical reporting.



