राज्यपाल ने UCC और धर्मांतरण कानून विधेयक को वापस भेजा।
एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा।

देहरादून/यूके साइबर न्यूज/। कुछ समय पूरे टीवी चैनलों में और बड़ी बड़ी होर्डिंगों में अपने देखा होगा कि सरकार द्वारा राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) और धर्मांतरण कानून जैसे बड़े विधेयक पारित कर दिए है, और ऐसा करने वाला उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बन गया है, वर्तमान भाजपा सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मान कर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रही थी। लेकिन इन विधेयकों को राज्यपाल द्वारा वापस भेजा गया है, जो कि सरकार की अधूरी कार्यशैली को दर्शाता है और जल्दबाजी में उठाया गया कदम लगता है। हालांकि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। जब राज्यपाल किसी विधेयक को वापस भेजते हैं, तो इसके पीछे विशिष्ट संवैधानिक प्रावधान और कारण होते हैं।
1. राज्यपाल की वीटो शक्ति:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, जब कोई विधेयक राज्य विधानसभा से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है, तो उनके पास तीन विकल्प होते हैं-:
- विधेयक पर अपनी सहमति देना।
- विधेयक को रोक लेना।
- विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेज देना।
2. इन विधेयकों को वापस भेजने के संभावित कारण:
राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गुरमीत सिंह द्वारा उठाई गई आपत्तियां अक्सर निम्नलिखित श्रेणियों में होती हैं-:
- विधेयक के प्रावधान मौलिक अधिकारों के साथ मेल खाते हैं या नहीं।
- शब्दावली में कोई अस्पष्टता है, जिससे भविष्य में कानूनी पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं।
- UCC जैसे विषय समवर्ती सूची के करीब आते हैं, इसलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे केंद्रीय कानूनों के साथ विरोधाभासी न हों।
3. आगे की प्रक्रिया क्या होगी?
राज्यपाल द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर राज्य सरकार के पास अब दो रास्ते हैं:
- सरकार राज्यपाल द्वारा सुझाए गए बदलावों को स्वीकार करे और विधेयक को दोबारा फिर से पारित करे।
- सरकार विधेयक को बिना किसी संशोधन के वैसे ही दोबारा पारित करके राज्यपाल को भेजे।
यदि विधानसभा विधेयक को दोबारा पारित करके राज्यपाल के पास भेजती है, तो संवैधानिक रूप से राज्यपाल उस पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होते हैं।
इन विधेयकों का राज्यपाल द्वारा वापस करने का अर्थ है कि उत्तराखण्ड सरकार ने जल्द बाजी में अधूरे बिलों को राज्यपाल के पास भेज दिया है, साथ ही यदि ये बिल पारित नहीं होते है तो सरकार द्वारा किया गया व्यापक प्रचार प्रसार में जो खर्चा किया वो सब व्यर्थ हो जाएगा और उत्तराखण्ड की वर्तमान सरकार बैकफुट पर आ जाएगी।



