गढ़वाल विवि में CUET पर सवाल:
छात्र आंदोलित, जनप्रतिनिधि खामोश, छात्रों ने फैसले पर उठाए सवाल

उत्तराखंड।देहरादून।श्रीनगर गढ़वाल
गढ़वाल विश्वविद्यालय में पीजी पाठ्यक्रमों में CUET लागू करने पर विवाद
पहाड़ के छात्रों के भविष्य पर फिर उठे सवाल
गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा स्नातकोत्तर (PG) पाठ्यक्रमों में CUET-PG (कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट) लागू करने के निर्णय ने एक बार फिर पहाड़ के छात्रों के भविष्य को लेकर बहस छेड़ दी है। छात्र संगठनों के विरोध के बाद यह मुद्दा अब विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर सार्वजनिक विमर्श में आ गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप लिया गया है, जबकि छात्र संगठनों और सामाजिक हलकों में इसे पहाड़ी क्षेत्रों के छात्रों के साथ अन्याय के रूप में देखा जा रहा है।
CUET क्या है और इसे क्यों लागू किया जा रहा है?
CUET यानी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट को केंद्र सरकार द्वारा देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश की एक समान प्रक्रिया के रूप में लागू किया गया है।
इसका संचालन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) करती है।
सरकारी तर्कों के अनुसार:
- प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी
- सभी छात्रों को समान अवसर मिलेगा
विश्वविद्यालयों में अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं की समस्या खत्म होगी
हालांकि, ज़मीनी स्तर पर इसके प्रभावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, खासकर पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में।
UG में CUET का अनुभव क्या रहा? CUET पहले ही स्नातक (UG) स्तर पर लागू हो चुका है।
पिछले वर्षों में इसके दौरान:
बड़ी संख्या में पहाड़ के छात्र परीक्षा केंद्रों तक नहीं पहुंच पाए
परीक्षा केंद्र मैदानी शहरों तक सीमित रहे
तकनीकी खामियां, नेटवर्क समस्याएं और यात्रा खर्च बड़ी बाधा बने
कई छात्रों को स्थानीय कॉलेजों में प्रवेश का अवसर ही नहीं मिल पाया
इन अनुभवों के बाद भी, अब PG स्तर पर CUET लागू किए जाने को लेकर छात्र संगठनों में असंतोष है।
PG में CUET से पहाड़ के छात्रों को क्या दिक्कतें हैं?
छात्र संगठनों और शिक्षाविदों के अनुसार:
- भौगोलिक समस्या
- पहाड़ों में परीक्षा केंद्रों की संख्या सीमित
- छात्रों को देहरादून, हल्द्वानी या अन्य शहरों में जाना पड़ता है
- आर्थिक बोझ
- यात्रा, ठहराव और परीक्षा शुल्क
- कोचिंग और ऑनलाइन तैयारी की असमान उपलब्धता
- स्थानीय विश्वविद्यालयों की भूमिका कमजोर
पहले विश्वविद्यालय अपने क्षेत्रीय संदर्भ में प्रवेश तय करता था।
अब स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा जा रहा
छात्र संगठनों का विरोध
CUET लागू करने के फैसले के खिलाफ हाल के दिनों में:
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े छात्र नेताओं ने विश्वविद्यालय परिसर में विरोध दर्ज कराया
कुछ छात्र नेताओं द्वारा प्रतीकात्मक रूप से छत पर चढ़कर विरोध किया गया छात्र संगठन ने विश्वविद्यालय गेट पर प्रशासन का पुतला दहन किया
छात्र संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो पहाड़ के छात्र उच्च शिक्षा से और दूर होते जाएंगे।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को लेकर उठ रहे हैं।
UG में CUET लागू होने के समय भी विरोध सीमित रहा
अब PG स्तर पर भी वही स्थिति दिखाई दे रही है
पहाड़ के हितों की बात करने वाले नेता इस मुद्दे पर खुलकर सामने नहीं आए हैं, छात्र संगठनों का कहना है कि केवल छात्र आंदोलन से यह फैसला वापस नहीं होगा, इसके लिए जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदाय को भी आगे आना होगा।
क्या गढ़वाल विश्वविद्यालय स्थानीय छात्रों से कटता जा रहा है?
गढ़वाल विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों के छात्रों को अपने क्षेत्र में उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना था।
लेकिन लगातार बदलती प्रवेश नीतियों के चलते यह सवाल खड़ा हो रहा है कि..
क्या विश्वविद्यालय अब पहाड़ के छात्रों के लिए नहीं, बल्कि नीतिगत प्रयोगों का केंद्र बनता जा रहा है?
CUET का उद्देश्य समानता हो सकता है
लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियाँ अलग हैं
UG के बाद अब PG में CUET लागू करना बिना स्थानीय विकल्प दिए गंभीर चिंता का विषय है
छात्र विरोध कर रहे हैं, लेकिन व्यापक समर्थन के बिना बदलाव मुश्किल है
अब यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं।
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